
रवांई गौरव सम्मान, स्मृति और बँगानी लेखन की पहली शुरुआत

जगमोहन बंगाणी
एक सुबह, एक फ़ोन और भीतर उतरती खुशी
सुबह का समय था। बाहर हल्की-सी ठंड थी और कमरे में अब भी रात की नमी बची हुई थी। खिड़की से आती धुँधली रोशनी बता रही थी कि दिन धीरे-धीरे जाग रहा है। इसी बीच अचानक फ़ोन की घंटी बजी। यह कोई ऐसी तेज़ या बेचैन कर देने वाली आवाज़ नहीं थी, बल्कि ऐसी घंटी थी जो नींद को तोड़ती नहीं, बल्कि भीतर की चुप्पी को छू लेती है। फ़ोन उठाया तो दूसरी ओर से शांत और स्नेह भरी आवाज़ आई- “जगमोहन भाई, बधाई हो। रवांई लोक महोत्सव 2025, नौगाँव की ओर से इस वर्ष का ‘रवांई गौरव सम्मान’ आपके नाम घोषित किया गया है और 28 दिसंबर 2025 को सम्मान ग्रहण करने के लिए आपकी उपस्थिति आवश्यक है।”
कुछ पल के लिए शब्द कानों में ही अटक गए। समझ तो आ गया था कि क्या कहा गया है, लेकिन मन उसे पूरी तरह स्वीकार करने में थोड़ा समय ले रहा था। जैसे भीतर कहीं कुछ ठहर गया हो। खुशी थी, पर वह दिखावे वाली या शोर मचाने वाली खुशी नहीं थी। वह धीरे-धीरे भीतर उतरती हुई, शांत और गहरी खुशी थी। ऐसी खुशी जिसमें कोई उछाल नहीं होता, बस एक लंबी साँस होती है, जो मन को हल्का कर देती है। फ़ोन रखते ही यादों का एक सिलसिला-सा चल पड़ा। गाँव की तस्वीरें एक-एक कर मन में उभरने लगीं। हर साल सर्दियों में गाँव जाने की एक खिंचाव-सी महसूस होती है। यह मौसम ही कुछ ऐसा होता है, जब पहाड़ अपने सबसे सच्चे और सरल रूप में सामने आता है। ठंडी हवा का स्पर्श, सूखे पत्तों की चरमराहट, सुबह की हल्की धूप और शाम को जल्दी उतरती खामोशी—सब कुछ मन को भीतर तक छू लेता है। इसी बीच ईजा और बाबा की तस्वीर आँखों के सामने आ गई। उनके चेहरे, उनकी आवाज़ें और वह अनकहा इंतज़ार, जो हर बार गाँव लौटने पर महसूस होता है। सर्दियों में उनके पास बैठना, आग तापना, और बिना ज़्यादा बोले बहुत कुछ समझ लेना—यह सब अपने-आप याद आने लगा। ईजा का धीरे से हाल पूछना और बाबा का चुपचाप पास बैठ जाना, जैसे उनके होने भर से ही सब ठीक हो जाता हो।
इस सम्मान की ख़बर ने मन में गर्व के साथ-साथ एक जिम्मेदारी का भाव भी जगा दिया। लगा कि यह केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं है, बल्कि उस मिट्टी, उन लोगों और उस संस्कृति की पहचान है, जिसने मुझे गढ़ा है। सुबह का वह फ़ोन अब सिर्फ़ एक सूचना नहीं रहा था। वह भीतर तक उतर चुकी खुशी, स्मृतियों और अपनत्व का एक शांत क्षण बन चुका था, जो देर तक मन के साथ बना रहा।
यात्रा का संकल्प और बँगानी लेखन का विचार
वैसे तो इस बार भी गाँव जाने का विचार बन रहा था, लेकिन मन दुविधा में था कि जाऊँ या न जाऊँ। दिल्ली से गाँव तक का सफ़र बहुत लंबा हो जाता है और अकेले जाने में थोड़ा असहज भी लगता है। जब कोई साथ होता है, तो रास्ते भर बातें करने का समय मिल जाता है और पहाड़ों को देखने का मन भी खुला रहता है। लेकिन अब गाँव जाना अनिवार्य हो गया था, क्योंकि रवांई गौरव सम्मान ने इस यात्रा को एक ठोस कारण दे दिया था, एक स्पष्ट दिशा दे दी थी।” तभी मन में सुभाष दादा का ख़याल आया। सोचा—क्यों न उनसे पूछा जाए। फोन किया। बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि उन्होंने बिना किसी हिचक के “हाँ” कह दी। जैसे वे पहले से ही तैयार बैठे हों। फिर बात आगे बढ़ी।
सम्मान की यात्रा को केवल कार्यक्रम तक सीमित क्यों रखा जाए? क्यों न इस यात्रा के साथ कुछ ऐसा भी किया जाए, जो लंबे समय तक याद रहे। तभी बँगानी लेखन की कार्यशालाओं का विचार आया। टिकोची, चिवां आराकोट, त्यूणी और मोरी, ये नाम केवल जगहों के नहीं थे, ये भाषा के घर थे। सोचा कि अगर इन जगहों पर बच्चों के साथ अपनी भाषा में बात की जाए, तो शायद कुछ अच्छा हो सके। कुछ लोगों से फोन पर बात हुई। तारीख़ें तय हो रही थीं। क्रिसमस के आसपास 26–27 दिसंबर को त्यूणी और 29–30 दिसंबर को टिकोची में कार्यशाला की योजना बनी। मन में पूरा हौसला था। लेकिन दो दिन बाद अचानक सरकारी आदेश आया कि 27 दिसंबर को उत्तराखंड के सभी विद्यालयों में अवकाश रहेगा। ऐसे में त्यूणी की पाठशाला फिर से रद्द करनी पड़ी। मन थोड़ा उदास हुआ, पर यह भी समझ में आया कि हर काम अपनी ही गति से होता है। आख़िरकार तय हुआ कि 29–30 दिसंबर को टिकोची में कार्यशाला होगी। कम ही सही, पर शुरुआत तो होगी। और कई बार एक छोटी-सी शुरुआत ही आगे का रास्ता खोल देती है।

पहाड़ों की ओर लौटता रास्ता और रवांई गौरव सम्मान
सर्दी अपने पूरे असर में थी। सड़क पर घना कोहरा पसरा हुआ था। गाड़ियाँ धीरे चल रही थीं, जैसे रास्ता भी सोच-विचार कर आगे बढ़ रहा हो। इसी कारण दिल्ली से निकलने में देर हो गई। फिर भी दिन रहते देहरादून पहुँच गया। अगली सुबह मित्र कमलेश के साथ बड़कोट- नौगाँव के लिए निकल पड़ा। रास्ता जाना-पहचाना था, पर हर बार नया लगता है। शाम बड़कोट में बीती। लगभग पंद्रह वर्षों बाद वहाँ पहुँचना हुआ। यही वह कस्बा है जहाँ जीवन के कुछ सबसे अहम साल गुज़रे थे, जहाँ पहली बार यह सपना देखा था कि जीवन कला के साथ भी जिया जा सकता है। बड़कोट की गलियों में घूमते हुए लगा जैसे समय पीछे लौट आया हो। लेकिन बड़कोट बहुत बदल गया था- बिल्कुल वैसे जैसे कोई बचपन का दुबला-पतला दोस्त अचानक ओवरवेट हो जाए। सड़कें और गलियाँ तो वही थीं, पर मकान अब दो-मंज़िले हो गए थे। कहीं भी खाली खेत नहीं दिखता था । नए लोग, नए घर, नई दुकानें-ओह, कितना कुछ बदल गया था। मैं तो अपने पुराने बड़कोट को ढूँढता ही रह गया। उस स्कूल को भी देखने गया जहाँ बारहवीं तक पढ़ाई की थी। वहाँ खड़े होकर बहुत देर तक कुछ नहीं कहा- बस देखता रहा। कुछ पुराने दोस्तों से मुलाक़ात हुई। बातें शुरू हुईं तो समय का पता ही नहीं चला। हँसी भी आई, आँखें भी भर आईं। लगा जैसे बीते दिन फिर से सामने आ खड़े हुए हों।
अगले दिन हम नौगाँव, (मुरारी गाँव) पहुँचे। वहाँ सम्मान समारोह का आयोजन था। दूर-दूर के गाँवों से लोग आए थे। हर चेहरे पर स्नेह, आदर और अपनापन साफ़ दिखाई दे रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे यह केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आपसी रिश्तों और विश्वास का उत्सव हो। सम्मान मिलना अपने आप में एक भावुक क्षण होता है, लेकिन उससे भी अधिक भावुक वह एहसास होता है, जब लगता है कि लोग आपको अपना मानते हैं, आपके काम को समझते हैं और उसे महत्व देते हैं। उस पल मन भीतर तक भर आया। कार्यक्रम के दौरान कई नए लोगों से परिचय हुआ। कुछ से पहली बार मिलना हुआ, तो कुछ चेहरे जाने-पहचाने लगे। बातचीत हुई, हालचाल पूछे गए, और मुस्कानें बाँटी गईं। मंच पर बोले गए शब्दों से ज़्यादा असर उन नज़रों और भावनाओं का था, जो बिना कहे बहुत कुछ कह जाती हैं। कार्यक्रम देर शाम तक चला, लेकिन मुझे लगभग चार बजे वहाँ से निकलना पड़ा।

नौगाँव पुल पर सुभाष दादा पिछले लगभग दो घंटे से मेरा इंतज़ार कर रहे थे। उनके चेहरे पर न कोई शिकवा था, न थकान की झलक, बस वही शांत मुस्कान और सहजता। उनसे मिलते ही मन हल्का हो गया। फिर हम आराकोट की ओर चल पड़े। रास्ते भर बौंगान औनी बौंगानी भाषा पर बातें होती रहीं- उसकी जड़ों पर, उसके वर्तमान हालात पर और उसके भविष्य को लेकर। बच्चों की आँखों में बसे सपनों की चर्चा हुई और उन रास्तों की भी, जिन पर अभी बहुत दूर तक जाना है। यह यात्रा केवल रास्ते की नहीं थी, यह विचारों और भावनाओं की भी यात्रा थी। शाम होते-होते हम आराकोट पहुँच गए। ठंड काफ़ी बढ़ चुकी थी और दिन भर की यात्रा की थकान अब शरीर में साफ़ महसूस होने लगी थी। नरेंद्र रावत जी, जो हमारे रिश्तेदार हैं और आराकोट के पोस्ट मास्टर हैं, उन्होंने अपने घर बड़े स्नेह से हमारा स्वागत किया। घर के भीतर एक गहरा अपनापन था। ऐसा लगा जैसे हम कहीं बाहर से नहीं, बल्कि अपने ही घर लौटे हों।
थकान इतनी थी कि कंबल ओढ़ते ही नींद आ गई। बाहर पहाड़ की रात चुपचाप उतर रही थी। लेकिन घर के दूसरे हिस्से में नरेंद्र दादा, सुभाष दादा और अमित भैया देर रात तक बैठे रहे। बातचीत चलती रही- भाषा की, बच्चों की, स्कूल की और आने वाले दिनों की योजनाओं की। इन्हीं सहज बातों के बीच यह तय हुआ कि अगली सुबह प्रार्थना के समय थोड़ी देर के लिए आराकोट स्कूल जाया जाएगा, ताकि बच्चों से मुलाक़ात हो सके। स्कूल के प्रिंसिपल से बात कर अनुमति भी ले ली गई। सब कुछ बहुत सहज ढंग से हुआ, जैसे रास्ता अपने-आप खुलता चला गया हो।
टिकोची में बँगानी लेखन की पहली शुरुआत
बँगानी भाषा की पहली लेखन कार्यशाला का पहला पड़ाव था- राजकीय इंटर कॉलेज टिकोची, बंगान। यह कोई बड़ा शहर नहीं था, न ही कोई चमकदार मंच। यह एक साधारण-सा पहाड़ी स्कूल था, जो अपने आसपास फैले पहाड़ों की तरह शांत और स्थिर खड़ा था। स्कूल के प्रांगण में हल्की धूप फैल रही थी। दिसंबर की ठंड में वह धूप किसी वरदान की तरह लग रही थी। बच्चे ऊनी स्वेटर और कोट पहने हुए थे । कहीं-कहीं उनके हाथ ठंड से लाल हो रहे थे, पर उनकी आँखों में चमक थी। स्कूल के एक छोर पर कुछ कक्षाएँ खुले में चल रही थीं। अध्यापक कुर्सियों पर बैठे आपस में बातचीत कर रहे थे। बच्चे गलियारों में धीरे-धीरे चलते, कभी रुकते, कभी झाँकते, जैसे वे जानना चाहते हों कि आज स्कूल में कुछ अलग होने वाला है। घम्भीर रावत जी, जो इस विद्यालय के पूर्व प्रधानाध्यापक हैं, उनसे मुलाक़ात हुई। उनकी बातों में अनुभव था और आँखों में अपनापन। कुछ अन्य अध्यापक भी साथ थे। थोड़ी देर बातचीत के बाद उन्होंने बताया कि बँगानी लेखन कार्यशाला में रुचि रखने वाले छात्रों के नाम अभी केवल पाँच हैं। यह सुनकर मन में हल्की चिंता हुई, पर साथ ही यह भी लगा कि शुरुआत चाहे छोटी हो, पर सच्ची होनी चाहिए। हमने प्रधानाचार्य से निवेदन किया कि सभी छात्रों को केवल दस मिनट के लिए सेमिनार हॉल में भेज दिया जाए, ताकि उन्हें कार्यशाला का उद्देश्य समझाया जा सके। प्रधानाचार्य की सहमति मिलते ही कुछ ही देर में सभी छात्र-छात्राएँ सेमिनार हॉल में आ गए। हॉल में एक हलचल-सी थी, पर साथ ही जिज्ञासा भी साफ़ दिखाई दे रही थी। इसके बाद सुभाष दादा ने बहुत सरल और सहज शब्दों में बच्चों से बात की। उन्होंने बताया कि अपनी भाषा सीखना क्यों ज़रूरी है, बँगानी भाषा कैसे हमें अपनी जड़ों, अपने गाँव और अपनी संस्कृति से जोड़ती है, और यह दूसरी भाषाओं से किस तरह अलग और विशिष्ट है। उनकी बातों में कोई उपदेश नहीं था, बल्कि अपनापन था। इसी अपनत्व के कारण बच्चे पूरे ध्यान से सुनते रहे। बातचीत के अंत में बँगानी लेखन में रुचि रखने वाले छात्रों से हॉल में ही बैठने को कहा गया। अब कुल तैंतीस छात्र-छात्राएँ सामने थीं। यह संख्या भले ही बड़ी न हो, लेकिन उस पल यह किसी भी शुरुआत के लिए पर्याप्त और उम्मीद से भरी हुई थी।

सुभाष दादा ने कार्यशाला की शुरुआत किसी भाषण से नहीं की। उन्होंने बच्चों से सीधे बातें कीं । बिल्कुल वैसे, जैसे घर में बड़े लोग बच्चों से बात करते हैं। उन्होंने सरल शब्दों में बताया कि अपनी भाषा क्यों ज़रूरी है। बँगानी भाषा केवल बोलने का साधन नहीं है, बल्कि वह हमारी स्मृति, हमारे रिश्ते और हमारे पहाड़ों की आवाज़ है। इसके बाद बच्चों को छोटे-छोटे खेलों में शामिल किया गया। पहले खेल में बच्चों ने अपने-अपने नाम अलग-अलग ढंग से बोले । ज़ोर से, हँसते हुए, धीरे-धीरे। हॉल में हँसी फैल गई। बच्चों का संकोच धीरे-धीरे टूटने लगा। दूसरे अभ्यास में बच्चों ने गोल घेरा बनाया। कभी वे हॉल में इधर-उधर चले, कभी दौड़े और अचानक रुक गए। यह खेल नहीं था, यह शरीर और भाषा के बीच की दूरी को कम करने का तरीका था। इसके बाद सभी बच्चे ज़मीन पर गोल घेरा बनाकर बैठ गए। उन्हें कहा गया कि वे अपने रोज़मर्रा के जीवन में सुने जाने वाले बँगानी शब्दों में से कोई एक काग़ज़ पर लिखें। काग़ज़ पर शब्द उतरने लगे । किसी शब्द में माँ की आवाज़ थी, किसी में खेतों की मिट्टी, किसी में रास्ते की चढ़ाई। फिर एक-एक करके बच्चों ने अपने शब्द पढ़े और उनका अर्थ बताया। उसके बाद उन्हीं शब्दों से वाक्य बनाए गए।
33 बच्चों ने 33 शब्दों से 33 वाक्य बनाए। वे वाक्य बहुत बड़े नहीं थे, पर उनमें जीवन था। ऐसा लग रहा था जैसे भाषा बच्चों के भीतर से निकलकर काग़ज़ पर बैठ गई हो।

गाँव, स्मृतियाँ और बीएएफ लर्निंग सेंटर
कार्यशाला के पहले दिन के बाद शाम होते-होते हम अपने गाँव माउंडा पहुँच गए। दिन भर की भागदौड़ और हलचल के बाद गाँव की शांति कुछ अलग ही लगती है। घर पहुँचे तो ईजा, बाबा, भैया, भाभी और घर के सभी सदस्यों से मुलाक़ात हुई। अपनों को सामने देखकर मन को थोड़ा सुकून मिला। ईजा और बाबा दोनों अब उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहाँ शरीर धीरे-धीरे जवाब देने लगता है। कुछ हफ़्ते पहले ईजा की आँख का ऑपरेशन हुआ था, पर अभी उन्हें पूरा आराम नहीं मिला है। आँख में दर्द बना रहता है, फिर भी उनके चेहरे पर वही अपनापन और धैर्य झलकता है। बाबा को कई दिनों से खाँसी ने घेर रखा है। उनकी कमज़ोरी साफ़ दिखाई दे रही थी। उन्हें इस हालत में देखकर मन भारी हो गया। लगता है जैसे समय चुपचाप बहुत कुछ बदल देता है, बिना बताए।
थोड़ी देर घर में बैठने के बाद हम छोटे भैया के साथ गाँव से थोड़ा आगे उस जगह पहुँचे, जहाँ बँगानी आर्ट फ़ाउंडेशन के लर्निंग सेंटर को समर्पित एक घर लगभग तीन साल से काठ-कूनी तकनीक से बन रहा है। शाम की ठंडी हवा में वहाँ बैठना अपने आप में सुकून देने वाला था। यह घर अभी पूरी तरह तैयार नहीं है, लेकिन दीवारें और छत खड़ी हो चुकी हैं। इसी वजह से यह केवल लकड़ी और पत्थर का ढाँचा नहीं लगता। यह घर एक सोच है, एक सपना है, जो धीरे-धीरे आकार ले रहा है। पहाड़ों के बीच खड़ा यह अधूरा घर भी पूरा-सा महसूस होता है, क्योंकि इसमें भाषा, कला और संस्कृति के सपने बसते हैं। वहीं बैठकर सुभाष दादा के साथ आने वाली गर्मियों की योजनाओं पर बात हुई। तय हुआ कि यहाँ बँगानी भाषा, कला और संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे, ताकि बच्चे और युवा अपनी जड़ों से जुड़ सकें। बातों-बातों में समय का पता ही नहीं चला। लौटते समय हम गाँव के ऊपर वाले रास्ते से आए। वहाँ से पूरा माउंडा गाँव साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था। छोटे-छोटे घर, खेत और धीरे-धीरे अँधेरा होता आसमान—सब कुछ एक चित्र की तरह सामने फैला हुआ था। ठंड तेज़ हो चली थी। घर आकर रजाई में बैठ गए। देर तक बातें होती रहीं—कुछ पुराने किस्से, कुछ नई योजनाएँ और कई ऐसे सपने, जो पहाड़ों की खामोशी में धीरे-धीरे आकार ले रहे थे।

शब्दों से जागती हुई भाषा और गीत में बदलते शब्द
अगली सुबह जल्दी उठकर हम टिकोची के लिए निकल पड़े। रास्ते में बलावत गाँव पड़ा, थोड़ी देर रुके। लकड़ी की सुंदर नक़्क़ाशी से बने पवासी और नरसिंह देवता के मंदिर देखे। मंदिर के आँगन में गाँव के कुछ लोगों से बँगानी भाषा पर बातें हुईं। मन खुश था, थोड़ी देर में ही हम टिकोची की ओर चल दिए। बँगानी लेखन कार्यशाला का दूसरा दिन था। दिसंबर की कड़ी ठंड में सूरज बादलों के बीच कभी झाँकता, कभी छिप जाता। स्कूल के बच्चे ठंड से सिकुड़े हुए थे। उनके छोटे गोरे गाल और भी लाल हो गए थे। फिर भी उनकी आँखों में उत्सुकता और मन में उमंग साफ दिखाई दे रही थी। थोड़ी देर स्कूल में बैठने के बाद सुभाष दादा और मैं सेमिनार हॉल में आ गए। सुभाष दादा ने ब्लैक बोर्ड पर छह अलग-अलग विषयों के कॉलम बनाए और पिछले दिन की कार्यशाला में बच्चों द्वारा बताए गए बँगानी शब्द लिखने लगे। ऐसा लग रहा था मानो भाषा फिर से साँस ले रही हो। कुछ ही देर में सभी बँगानी लेखन कार्यशाला के छात्र हॉल में आ गए। हमने उन्हें फिर से गोल घेरा बनाकर बैठाया और कल दिए गए गृहकार्य पर बातचीत शुरू हुई। बच्चों ने अपने लिखे शब्द बताए। कई नए शब्द सुनने को मिले। शब्दों में मिट्टी की खुशबू और पहाड़ की ठंडी हवा झलक रही थी। मन को बड़ा सुकून मिला। इसके बाद सभी ने मिलकर एक पुराना बँगानी गीत गाया- “मूले मिलाये राजा केरे मे लाए…” गीत गूँजते ही माहौल जीवंत हो गया। फिर बच्चों से कहा गया कि क्यों न हम एक नया गीत मिलकर बनाएँ। यह रचनात्मक अभ्यास अद्भुत था। सुभाष दादा का बच्चों के साथ तीस वर्षों का अनुभव साफ दिखाई दे रहा था। उन्होंने हर छात्र से कहा कि वह अपने आसपास की किसी चीज़ पर एक पंक्ति बोले, शर्त यह थी कि हर नई पंक्ति पिछली पंक्ति से जुड़ी हो। शब्द अपने आप बहने लगे और देखते-देखते एक पूरा गीत बन गया, जो की कुछ इस तरह से है —
“टिकोची बाजारे दी ठोरी-ठोरी,
अमके दिशे बाधे ऐजे बौरी-बौरी।
गौरू बौरी,
कुकुर बौरी,
मानुष बौरी,
किटकिशालो बौरी।
टिकोची बाजारे दी ठोरी-ठोरी,
अमके दिशे बाधे ऐजे बौरी-बौरी।।”
गीत बनने के बाद धुन पर अभ्यास हुआ। बच्चों ने अलग-अलग धुनों में गाया और अंत में सबकी सहमति से एक धुन तय हुई। फिर सबने मिलकर गीत बड़े आनंद और हँसी-खुशी के साथ गाया। उस पल लगा जैसे ठंड भी कम हो गई और भाषा बच्चों के साथ मुस्कुराई।

कहानियाँ, सीख और एक भरोसा
अगले अभ्यास में सुभाष दादा ने छात्रों से कहा कि ब्लैक बोर्ड पर लिखे गए छह विषयों में से कोई एक विषय चुनें। उस विषय से जुड़े शब्दों को ध्यान में रखते हुए उन्हें एक छोटी कहानी लिखनी थी। यह सुनते ही बच्चों के चेहरे पर एक अलग-सी गंभीरता आ गई। सभी छात्र पूरे सेमिनार हॉल में अलग-अलग जगहों पर बैठ गए। कोई खिड़की के पास, कोई दीवार से टिककर, तो कोई हॉल के बीचोंबीच। सब अपने-अपने स्थान पर धीरे-धीरे, बहुत ध्यान से, अकेले-अकेले लिखने लगे। कुछ ही क्षणों में हॉल में एक हल्की-सी खामोशी छा गई, मानो समय कुछ देर के लिए थम गया हो। उस खामोशी के बीच केवल काग़ज़ पर चलती कलम की आवाज़ सुनाई दे रही थी- कभी तेज़, कभी धीमी। कभी-कभी किसी बच्चे की गहरी साँस या कुर्सी के हल्के हिलने की आवाज़ भी महसूस होती। ऐसा लग रहा था जैसे हर छात्र अपनी ही दुनिया में डूबा हुआ है। कोई अपनी यादों के गाँव में घूम रहा है, कोई बचपन के खेलों को फिर से जी रहा है, तो कोई अपने मन के भीतर छिपे सपनों को शब्दों का रूप दे रहा है। लगभग तीस मिनट बाद सभी ने अपनी-अपनी कहानियाँ लिखकर जमा कर दीं। जब उन कहानियों को देखा गया, तो समझ में आया कि यह अभ्यास कितना गहरा था। किसी की कहानी अपने गाँव की सरल और प्यारी यादों से भरी हुई थी—घर, खेत, पेड़ और पहाड़। किसी ने अपने बचपन के खेल, दोस्तों और मासूम लम्हों को शब्दों में पिरोया था। किसी छात्र ने अपने मन के सपनों और अनकहे ख्वाबों को काग़ज़ पर उतार दिया था। हर कहानी अलग थी, लेकिन हर एक में बच्चों की अपनी भावनाएँ, अनुभव और कल्पनाओं की साफ़ झलक दिखाई दे रही थी। यह बँगानी लेखन की पहली कार्यशाला थी, जो अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुकी थी। अंत में सभी छात्रों को फिर से एक साथ बैठाया गया। सुभाष दादा ने उन्हें बँगानी भाषा के कुछ छोटे-छोटे शब्द सिखाए, जिनका उच्चारण हिन्दी से अलग है। जैसे हिन्दी में “भगवान”, बँगानी में “बगवान” और हिन्दी में “झाड़ू”, बँगानी में “जाडु।” शब्द छोटे थे, लेकिन उनमें अपनी मिट्टी की खुशबू और अपनी पहचान छिपी हुई थी।
इसके बाद हम सब स्कूल के प्रांगण में आए। साथ-साथ खड़े होकर कुछ समूह चित्र खिंचवाए गए। फिर सभी ने एक साथ ऊँची आवाज़ में कहा- “सौदा चायीं थो ईशोई बै।” यह केवल एक वाक्य नहीं था। यह एक भरोसा था—कि भाषा लौटेगी, कि बच्चे उसे आगे बढ़ाएँगे, और कि यह पहली कार्यशाला एक शुरुआत है, अंत नहीं।
