
- नीरज उत्तराखंडी, मोरी/पुरोला/उत्तरकाशी
जनपद उत्तरकाशी के सीमांत क्षेत्रों मोरी, सरबडियार, हर्षिल और डुंडा में सदियों पुरानी पारम्परिक कताई-बुनाई की कला आज संकट के दौर से गुजर रही है। भेड़-बकरी पालन से प्राप्त ऊन पर आधारित यह कुटीर उद्योग कभी स्थानीय लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन हुआ करता था, लेकिन बदलते समय, बाजार की कमी और आधुनिक उत्पादों की प्रतिस्पर्धा के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है।
स्थानीय लोगों के अनुसार पहले लगभग हर गांव में कई घरों में चरखा और करघा चलता था, लेकिन आज गिने-चुने परिवार ही इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

इन क्षेत्रों में विशेषकर महिलाएं घरों में चरखे से ऊन कातकर हाथकरघे पर शॉल, थुलमा, टोपी, मफलर और अन्य ऊनी वस्त्र तैयार करती रही हैं। यह शिल्प स्थानीय संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
भेड़-बकरी पालन से जुड़ी है बुनाई की परंपरा
मोरी, हर्षिल और सरबडियार जैसे ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्रामीण बड़ी संख्या में भेड़-बकरी पालन करते हैं। इन पशुओं से मिलने वाली ऊन को महिलाएं पारम्परिक चरखे से कातकर धागा बनाती हैं और फिर हाथकरघों पर विभिन्न प्रकार के ऊनी वस्त्र तैयार करती हैं।

स्थानीय समुदायों, विशेषकर भोटिया और जाड़ समुदाय की महिलाएं पीढ़ियों से इस शिल्प को जीवित रखे हुए हैं। इन उत्पादों में पारम्परिक डिजाइन और प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया जाता है, जो इस कला को विशिष्ट पहचान देते हैं।
बाजार और उचित मूल्य का अभाव
स्थानीय बुनकरों का कहना है कि उनके उत्पादों को उचित बाजार नहीं मिल पाता। कई बार बिचौलिए बहुत कम कीमत पर ऊन खरीद लेते हैं और बाद में उसी से बने उत्पाद महंगे दामों पर बाजार में बेचते हैं। इससे बुनकरों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
मोरी क्षेत्र की एक बुनकर कमला देवी बताती हैं,
“पहले हमारे घरों में ऊन से कपड़े बनाकर लोग अपनी जरूरत भी पूरी करते थे और कुछ सामान बाजार में भी बेच लेते थे। अब मशीन से बने सस्ते कपड़ों की वजह से हमारे हाथ से बने उत्पादों की मांग कम हो गई है।“
इसके अलावा मशीन से बने सस्ते ऊनी कपड़ों की बढ़ती उपलब्धता ने भी पारम्परिक उत्पादों की मांग को प्रभावित किया है।

नई पीढ़ी का कम होता रुझान
स्थानीय लोगों के अनुसार पहले लगभग हर घर में चरखा और करघा होता था, लेकिन अब नई पीढ़ी रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रही है। इससे पारम्परिक कताई-बुनाई का ज्ञान भी धीरे-धीरे समाप्त होने का खतरा बढ़ रहा है।
सरकार और बाजार से उम्मीद
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन क्षेत्रों में ऊन के संगठित बाजार, प्रशिक्षण केंद्र और विपणन सुविधाएं विकसित की जाएं तो यह उद्योग फिर से स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है। हाल ही में डुंडा क्षेत्र में ऊन बाजार विकसित करने की पहल भी सामने आई है, जिससे स्थानीय बुनकरों को सीधे बाजार से जोड़ने की उम्मीद जगी है।

समाधान की दिशा
- स्थानीय स्तर पर ऊन और ऊनी उत्पादों के लिए स्थायी बाजार की स्थापना
- बुनकरों को प्रशिक्षण और आधुनिक डिजाइन की जानकारी
- स्वयं सहायता समूह और सहकारी समितियों के माध्यम से विपणन व्यवस्था
- पर्यटन स्थलों पर स्थानीय उत्पादों की बिक्री को बढ़ावा
बहरहाल, यदि समय रहते इन पारम्परिक कुटीर उद्योगों को संरक्षण और बाजार उपलब्ध कराया जाए, तो न केवल सीमांत क्षेत्रों के लोगों की आजीविका मजबूत होगी बल्कि उत्तराखंड की समृद्ध हस्तशिल्प परंपरा भी सुरक्षित रह सकेगी।
