
एसआरआई संस्था द्वारा आयोजित महिला रामलीला में जब मंच पर उमड़ी आस्था, संवेदना और नारी शक्ति की धारा
- हिमांतर ब्यूरो, हल्द्वानी
हल्द्वानी के शीशमहल काठगोदाम में इन दिनों चल रही एसआरआई (SRI) संस्था की महिला रामलीला सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि भावनाओं, आस्था और नारी सशक्तिकरण का जीवंत उत्सव बन गई है। पांचवें दिन मंचित केवट प्रसंग और राम-भरत मिलाप ने दर्शकों को ऐसा भावविभोर किया कि कई आंखें नम हो उठीं।
रामलीला के इस मंच पर जब केवट ने प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण को गंगा पार कराने से पहले उनके चरण धोने की विनम्र जिद की, तो यह दृश्य केवल अभिनय नहीं रहा—यह भक्ति का साक्षात रूप बन गया। केवट के संवादों में समर्पण था, श्रद्धा थी और वह भाव था जो सीधे दर्शकों के हृदय तक पहुंचा। राम नाम की महिमा का गुणगान करते इस प्रसंग ने माहौल को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।
इसके बाद ‘दशरथ मरण’ का दृश्य आया, जहां पुत्र-वियोग में टूटे राजा दशरथ की पीड़ा ने दर्शकों को गहराई से झकझोर दिया। सुमंत्र का अकेले अयोध्या लौटना और दशरथ का विलाप—इन दृश्यों ने मंच और दर्शकों के बीच की दूरी को पूरी तरह समाप्त कर दिया।

रामलीला का सबसे मार्मिक क्षण तब आया, जब चित्रकूट में राम-भरत मिलाप का मंचन हुआ। भरत का अपने बड़े भाई के प्रति प्रेम, उनका अयोध्या लौटने का आग्रह और राम का धर्म के प्रति अडिग रहना—इन सबने वातावरण को करुणा और आदर्शों से भर दिया। जब भरत ने राम की चरण पादुकाएं मांगकर उन्हें सिंहासन पर स्थापित करने का संकल्प लिया, तो यह दृश्य त्याग और मर्यादा का अद्भुत उदाहरण बन गया।
इस पूरी प्रस्तुति की खास बात यह रही कि सभी भूमिकाएं महिलाओं ने निभाईं। राम की भूमिका में मानसी रावत, लक्ष्मण के रूप में अंशिका जीना, सीता के रूप में खुशी जोशी और केवट की भूमिका में दीपा तिवारी ने अपने अभिनय से दर्शकों का मन मोह लिया। दशरथ के रूप में भुवनेश्वरी जोशी और भरत की भूमिका में यशस्वी जोशी ने भी अपने किरदारों को जीवंत बना दिया।
निर्देशक मुकेश कुमार जोशी के कुशल निर्देशन और मोहन चन्द्र जोशी के संगीत ने पूरी प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाया, वहीं कुश पांडे के तबले की थाप ने भावनाओं को और गहराई दी।
कार्यक्रम के दौरान संस्था की अध्यक्ष तनुजा जोशी ने कहा कि महिला रामलीला न केवल सांस्कृतिक परंपरा को जीवित रख रही है, बल्कि महिलाओं की छिपी प्रतिभाओं को मंच देने का सशक्त माध्यम भी बन रही है। उन्होंने यह भी संदेश दिया कि राम के आदर्शों पर चलकर समाज और शासन में सकारात्मक योगदान देना हम सभी की जिम्मेदारी है।
इस आयोजन में क्षेत्र के कई गणमान्य लोग भी उपस्थित रहे, जिन्होंने कलाकारों के प्रयासों की सराहना की।
शीशमहल की यह महिला रामलीला यह साबित कर रही है कि जब परंपरा और नारी शक्ति एक साथ मंच पर उतरती हैं, तो केवल नाटक नहीं, बल्कि एक जीवंत अनुभव जन्म लेता है—जो दिलों में लंबे समय तक बस जाता है।
