राम नवमी : आइए श्रीराम को जीवन में स्थापित करें!

Ram Navami

 

राम नवमी पर विशेष

प्रो. गिरीश्वर मिश्र
शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा  

शाश्वत मूल्य बोध के विग्रह स्वरूप श्रीराम भारतीय संस्कृति के एक ऐसे लोक-विश्रुत मानवीय उत्कर्ष हैं जो पढ़े-लिखे और अनपढ़ समाज के हर वर्ग के लिए युगों-युगों से प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं । साहित्य जगत राम-कथा में कल्पना और रस का अजस्र स्रोत ढूंढा है और पिछली पीढ़ियों के कवियों और लेखकों ने अपने सृजन का आधार बनाया । साहित्य की यह परम्परा आज भी अप्रतिहत रूप से चल रही है। इस परंपरा का स्पष्ट संदेश है कि पृथ्वी पर श्रीराम का आविर्भाव और अवतरण मात्र लोक कल्याण के हित हुआ था। उनको अयोध्या के राजा के पुत्र दशरथनंदन के व्याज से मानुष भाव में प्रतिष्ठित करते हुए भारतीय मनीषा मनुष्यता की चुनौतियों, उसके द्वन्द्वों, संघर्षों और उपलब्धियों से परिचित कराते हैं।

महर्षि वाल्मीकि को राम कथा को लोक तक पहुँचाने  वाले  प्रथम रचनाकार का सम्मानित दर्जा मिला हुआ है। वाल्मीकि रामायण की प्राचीनता भी इस तथ्य की पुष्टि करती है। उसमें वर्णित श्रीराम की यह विलक्षण गाथा मनुष्य द्वारा सत्य के चरम साक्षात्कार करते रहने के लिए निर्मम आह्वान करती है। यह अलौकिक गाथा इस तथ्य को रेखांकित करती है कि कदाचित मनुष्य जीवन की यह एक अनिवार्य विडम्बना है कि उसमें ऊपर उठने और नीचे गिरने दोनों तरह की प्रवृत्तियाँ सहज संभव हैं। जीवन में दिन और रात की तरह  उत्कर्ष और अपकर्ष दोनों की उपस्थिति स्वाभाविक है। इनके बीच संतरण के लिए धर्म के अनुकूल कर्तव्य पालन ही एक मात्र साधन उपलब्ध है। यही वह रसायन या प्रौद्योगिकी है जो जीवन में अनुभव की जाने वाली सीमाओं को संभावनाओं में बदल देती है।

यह विचारणीय है कि श्रीराम का पूरा जीवन ही विभिन्न भूमिकाओं के आपसी द्वंद्वों और उससे जुड़ी तरह-तरह की चिंताओं से भरा हुआ जीवन है। पुत्र, शिष्य, पति, भाई, युवा, मित्र, योद्धा, और राजा आदि विभिन्न रूपों में श्रीराम लगातार एक से बढ़ कर एक चुनौती का सामना करते हैं। उन्हें लगातार पीड़ा सहनी पड़ती है और दुख उठाने पड़ते हैं । एक प्रतापी राजा के युवराज होने पर भी उनके धैर्य की परीक्षा कदम-कदम पर जीवन भर निरंतर ली जाती रही। रामायण के कई पात्रों में उनके प्रति ईर्ष्या, द्वेष, संदेह और घृणा के भाव भी उपजते रहे। राक्षसराज लंकापति रावण के रूप में उनके सम्मुख चरम जटिलता वाली चुनौती उपस्थित होती है। ज्ञानी और समृद्ध राजा हो कर भी धर्म का विरोध करने की दुर्बुद्धि रावण को श्रीराम का शत्रु बना देती है। वह शौर्य में अद्वितीय था, इतना कि राम और रावण का युद्ध अतुलनीय हो गया – रामरावणयोर्युद्धो रामरावणयोरिव । फिर भी रावण को धर्मविरुद्ध आचरण करने में किसी तरह की शंका नहीं होती थी और परिणाम बड़ा घातक हुआ और सभी राक्षस मारे गए और स्वर्णपुरी विनष्ट हो गई।

जीवन में आने वाले संघर्षों के समाधान के लिए श्रीराम एक नीतिज्ञ के रूप में अपनी दैहिक, दैविक और भौतिक सभी तरह की शक्तियों को संयोजित करते हैं। वे नर हों या वानर सबका सहयोग लेते हैं और धर्म की रक्षा करने का जतन करते हैं। वे स्वयं मर्यादा का निर्वाह करते हैं और उसके उल्लंघन को दण्डित करना उनकी नीति है । उनकी धर्म-व्यवस्था बड़े मूल्यों के सापेक्ष है और परिस्थिति की विशेषताओं को ध्यान में रखती है। शायद श्रीराम के धर्म की गत्यात्मकता ही उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण है। तभी भारत और एशिया के कंबोडिया और इंडोनेशिया जैसे कई देशों में श्रीराम लोकप्रिय हुए। वे जन-स्मृति का हिस्सा बनते गए और उनकी कथा सबके मानस में गहरे उतरती गई । इसका जीवित प्रमाण है अनेकानेक भाषाओं में राम-कथा का निरंतर लेखन, अंकन, मंचन और गायन। उत्तर हो या दक्षिण, पूर्व हो या पश्चिम देश के हर क्षेत्र में राम की उपस्थिति है। अयोध्या के भव्य श्रीराम मंदिर के लोकार्पण के बाद कुछ ही समय में करोड़ों भक्तों के आगमन और उनके दर्शन-लाभ लेने से श्रीराम की भारतीय मानस में उकेरी दिव्य छवि की पुष्टि हुई है।

रामायण आज भारत की हर भाषा में है और यह परम्परा बड़ी प्राचीन है। सबने हृदय से उसे अपनाया पर उसे आत्मसात करते हुए क्षेत्र विशेष की परम्पराओं के अनुसार राम कथा के कथानक और आख्यानों में भी बदलाव आया । यह स्वाभाविक भी था क्योंकि राम अपने हैं और अपना अपनों जैसा ही होना चाहिए, तभी वह अपना होता है। एक दूसरा बड़ा कारण यह भी था कि राम कथा आरम्भ से ही वाचिक परम्परा से जुड़ी रही और उसके वक्ता कथा कहते हुए स्मृति विस्मृति से गुजरते हुए अपनी ओर से जोड़ घटा देता है। अवधी भाषा में रचित गोस्वामी तुलसीदास जी का ‘रामचरितमानस’ पिछली पाँच सदियों से लोक जीवन में प्रतिष्ठित है और राम कथा को विशेष रूप से प्रचारित-प्रसारित किया। आज भी  राम कथा वाचकों की परम्परा लोकप्रिय है। उनकी कथाओं में श्रीराम के विविध रूप मिलते हैं जिसे आसानी से लक्षित किया जा सकता है पर श्रोता सभी संस्करणों का रस लेते हैं । तभी गोस्वामी तुलसीदास को कहना पड़ा – राम कथा कै मिति जग नाहीं – राम कथा की गणना नहीं की जा सकती। वैसे भी अनादि और अनंत ईश्वर के अवतार की महिमा को एक सीमित कथा में अंटा पाना किसी के बूते की बात नहीं है। ऐसा करना संभव नहीं है।

आज के परिवेश में श्रीराम का स्मरण हमें अपने स्वभाव और कर्म पर विचार करने को उद्यत करता है। आज विश्व में युद्ध, आतंक और हिंसा की तीव्र और ऊँची लहरें सतत उठ रही है। इन दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के तात्कालिक कारण अक्सर बदले की भावना और उससे उपजती फौरी कारवाई होती है परंतु अनावश्यक प्रतिस्पर्धा और लिप्सा सबको लीलती जा रही है। अनियंत्रित लोभ इनके लिए आवश्यक ऊर्जा जुटाते हैं। इसके पीछे आज की बदलती जीवन दृष्टि ही ज़िम्मेदार प्रतीत होती है। अब ज़्यादा से ज़्यादा मात्रा में उपभोग को ही आदमी अपने सुख का आधार मानते हुए आगे बढ़ रहा है। आज का आदमी आख मूँद कर वस्तुओं की ओर लालायित दृष्टि से देखता है और उनको पाने के लिए कुछ भी दाँव पर लगाने से नहीं डरता आगे चाहे अंजाम कुछ भी हो । इसका दायरा इतना बढ़ता जा रहा है कि सभी नाते रिश्ते भूलते जा रहे हैं और अपने सीमित स्वार्थ की पूर्ति के आगे सबको तिलांजलि दी जा रही है। धर्म और अधर्म से परे अपने शक्ति और प्रभाव को बढ़ाने और बढ़ते रहना ही आज के विश्व में प्रिय हो रहा है परन्तु इसके दुष्परिणाम सर्वत्र दिख रहे हैं।

अपने को बुद्धि और विवेक का स्वामी घोषित करने वाला मनुष्य आज कृत्रिम मेधा के बल पर बड़ी तेजी से सब कुछ मुट्ठी में कर लेने को उतावला हो रहा है। यह सृष्टि में कई स्तरों पर असंतुलन लाने वाला कदम साबित हो रहा है। अधिकाधिक मारक शक्ति वाले विभिन्न किस्म के मिसाल और न्यूक्लियर हथियारों की सहायता से अब हजारों मील की दूरी से नियंत्रित पहल द्वारा सटीक आक्रमण की सहायता से शत्रु के संहार की सुनिश्चित कारवाई अप्रत्याशित रूप से अधिकाधिक घातक होती जा रही है। इसकी चपेट में आकर मनुष्य जीवन दूभर हो रहा है पर साथ ही पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र भी प्रदूषित और क्षतिग्रस्त हो रहा है। चार चार वर्षों से युद्ध चल रहा है। एक दूसरा युद्ध रुका पर अब दूसरा युद्ध शुरू है जो अपनी चपेट में सबको समेट रहा है। युद्ध में दोनों पक्ष हताहत होते हैं। युद्ध से युद्ध का समाधान होता नहीं दिखता।

आज धरती पर जीवन के सामने चुनौतियां बढ़ती जा रही है। प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से ऐसे हस्तक्षेपों से कमो बेश दुनिया के सभी देश प्रभावित हो रहे हैं। इस तरह की कारवाई के चलते जीवन की आधारभूत जरूरतों यानी जल, वायु और अन्न सभी पर संकट मंडरा रहा है। हमारी जीवन शैली में ऊर्जा की खपत अधिक होती जा रही है इसलिए पेट्रोल और गैस जैसे संसाधनों की जरूरत बढ़ रही है । बड़े रसूख वाले धनी और राजनैतिक प्रभाव वाले देश नियमों, कानूनों और मानवीय मूल्यों को धता बताते हुए दूसरे देशों पर अधिकार जमाने के लिए अपने को स्वतंत्र समझते हैं। यह एक निराशाजनक स्थिति है जब संयुक्त राष्ट्र संघ जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन निष्प्रभावी या बे-असर होते जा रहे हैं। कुल मिला कर यह परिदृश्य मनुष्यता अपने विचार और कर्म पर विचार करने को बाध्य कर रहा है। रामायण धर्म को सार घोषित करता है – धर्मादर्थ: प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम्, धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदम् – धर्म से ही धन, सुख और सब कुछ प्राप्त होता है, संसार में धर्म ही सार है। श्रीराम का धर्म-भाव आदर्श, मर्यादा, धैर्य, सहनशीलता, त्याग, समानता, प्रेम, विनम्रता और क्षमा के आचरण में प्रकट होता है। इस राम भाव को आत्मसात करने में ही मनुष्यता का भविष्य छिपा है। आइए हम इसके माध्यम बनें।

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