
इला चंद्र जोशी पुरस्कार के तहत ₹50,000 नगद, सम्मान-पत्र, स्मृति-चिन्ह और अंगवस्त्र से होगा सम्मानित
- हिमांतर ब्यूरो, नौगांव-बड़कोट
सीमांत जनपद उत्तरकाशी ग्राम बिरगाड़ी से निकली एक सशक्त आवाज़ आज पूरे उत्तराखंड में गूंज रही है। अनोज सिंह ‘बनाली’, जो वर्तमान में उत्तराखंड के न्याय विभाग में कार्यरत हैं, को वर्ष 2025 के प्रतिष्ठित उत्तराखंड साहित्य गौरव सम्मान (इला चंद्र जोशी पुरस्कार) के लिए चयनित किया गया है। यह सम्मान उनके साहित्यिक योगदान के साथ-साथ उनके सामाजिक सरोकारों की भी बड़ी पहचान है।
कविताओं में जीवंत होता गांव और समाज
अनोज सिंह ‘बनाली’ की कविताएं केवल साहित्यिक रचनाएं नहीं, बल्कि गांव और समाज का जीवंत दस्तावेज़ हैं। उनके शब्दों में सास-बहू के रिश्तों की जटिलता, बेटी-बेटे की भावनाएं, माता-पिता की उम्मीदें, जनप्रतिनिधियों की भूमिका और सरकारी सेवकों की जिम्मेदारियां- सभी एक साथ उभरकर सामने आते हैं।
वे समाज की उन परिस्थितियों को भी उकेरते हैं, जिनके बीच आम जनजीवन निरंतर संचालित होता है। यही वजह है कि उनकी कविताएं पाठकों को अपने आसपास की सच्चाई से रूबरू कराती हैं।
युवाओं से संवाद, संस्कारों की चिंता
एक युवा रचनाकार के रूप में अनोज सिंह ‘बनाली’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे युवाओं से सीधे संवाद करते हैं। उनकी कविताओं में आधुनिक समय में युवाओं के बीच तेजी से हो रहे संस्कारों के क्षरण को लेकर गहरी चिंता झलकती है। वे मानते हैं कि देश और समाज की उन्नति का दारोमदार युवाओं के कंधों पर है, इसलिए उनका सही दिशा में मार्गदर्शन बेहद जरूरी है।
उनकी यही सोच उनकी कविताओं को एक अलग पहचान देती है-जहां वे सिर्फ भावनाएं व्यक्त नहीं करते, बल्कि एक जागरूक संवाद स्थापित करते हैं।
व्यंग्य के जरिए व्यवस्था पर प्रहार
अनोज सिंह ‘बनाली’ की रचनाओं में व्यंग्य का सशक्त पुट देखने को मिलता है।
वे राजनीति, व्यवस्था, अफसरशाही और समाज में व्याप्त कुठिंत मानसिकता पर तीखे लेकिन सार्थक प्रहार करते हैं। उनकी कविताएं केवल आलोचना नहीं करतीं, बल्कि एक ऐसे समाज की कल्पना भी करती हैं- जहां संस्कृति सुरक्षित हो, परंपराएं जीवित रहें और समाज अपनी मूल पहचान के साथ आगे बढ़े।
आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन
आज के बदलते दौर में जहां आधुनिकता तेजी से जीवनशैली को प्रभावित कर रही है, वहीं अनोज सिंह ‘बनाली’ अपनी रचनाओं के माध्यम से संतुलन की बात करते हैं। वे आधुनिकता के साथ कदम मिलाकर चलने की वकालत करते हैं, लेकिन साथ ही अपनी भाषा, वेशभूषा, खान-पान, स्थानीय संसाधनों और परंपराओं को बचाए रखने पर जोर देते हैं।
उनकी यह सोच उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
रवांल्टी कविता को नई पहचान देने का प्रयास
अनोज सिंह ‘बनाली’ की रचनाएं रवांल्टी बोली-भाषा के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उनकी कविताओं में स्थानीय बोली और भावनाओं का ऐसा सजीव समावेश है, जो उन्हें मुख्यधारा के साहित्य से अलग एक विशिष्ट पहचान प्रदान करता है। उनकी कविताएं रवांल्टी को युवाओं के बीच खासा लोकप्रिय बना रही हैं।
सम्मान समारोह: एक गौरवपूर्ण क्षण
यह सम्मान समारोह 30 मार्च 2026 को देहरादून स्थित मुख्यमंत्री कार्यालय के मुख्य सेवक सदन में आयोजित होगा। इस अवसर पर उन्हें ₹50,000 की धनराशि, सम्मान-पत्र, स्मृति-चिन्ह और अंगवस्त्र प्रदान किए जाएंगे।
गांव से जनपद तक खुशी की लहर
बिरगाड़ी गांव और पूरी रवांई घाटी में इस उपलब्धि को लेकर उत्साह का माहौल है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह सम्मान न केवल अनोज सिंह ‘बनाली’ का, बल्कि पूरी रवांई घाटी की सांस्कृतिक पहचान का सम्मान है।
एक युवा सोच, जो बदलाव की राह दिखाती है
अनोज सिंह ‘बनाली’ की यह उपलब्धि इस बात का प्रमाण है कि एक व्यक्ति अपने पेशे और जुनून दोनों में उत्कृष्टता हासिल कर सकता है। न्याय विभाग की जिम्मेदारियों के साथ-साथ साहित्य के माध्यम से समाज को दिशा देना-यह उनकी प्रतिबद्धता और संवेदनशीलता का परिचायक है।
