
जंगली जानवर नहीं पहुंचाते कोई नुक्सान

आलेख एवं फोटो- जे पी मैठाणी
उत्तराखंड के मैदानी भागों में जहां गर्मी बढ़िया पड़ती है – जैसे – देहरादून, ऋषिकेश, हल्द्वानी, सितारगंज, रुद्रपुर, तराई के अन्य क्षेत्र, ऋषिकेश, रूड़की, लक्सर, हरिद्वार, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, पुरोला, विकासनगर, रामनगर, यमकेश्वर, कर्णप्रयाग, लंगासू, नारायणबगड़, बागेश्वर, गरुड़ आदि मैदानी क्षेत्रों में काले धतूरे की खेती की जा सकती है. अत्यधिक ठण्ड से ये पौधा जाड़ों में सूख जाता है लेकिन अगर जमीन में नमी बनी हुई है तो फिर से वसंत के आने के साथ नयी कोंपलें फूटने लगती हैं.
कैसे बनाएं धतूरे की पौध- पेड़ पर ही पूरी तरह से सूख चुके धतूरे के फलों को एकत्र कर लें उनको फोड़कर चपटे – बैंगन के बीजों की तरह ही दिखने वाले धतूरे के बीज बाहर निकल जाते हैं. इन बीजो को एक रात भर पानी में भिगो कर रखें. अगले दिन पानी निठार कर बीजों को हल्की रेत के साथ मिलाकर तैयार क्यारी में बो दीजिये. 20 – 25 दिन में बीज ज़मने लगेगा – फिर 30- 40 दिन की पौध को लाइन से खेतों में रोप दीजिये. क्यारियों में ज्यादा पानी नहीं डालना है. इसको बहुत अधिक देख रेख निराई गुड़ाई की आवश्यकता नहीं होती है.

मैदानों में जहां ठीक गर्मी पड़ती है धतूरे के पौधे का जीवन काल 3- 4 वर्ष होता है यानी एक बार उगा पौधा जाड़ों में पाला गिरने से पत्तियां छोड़ देता है, फिर मार्च में नयी पत्तियां आने लगती हैं. फिर फूल और फल लगते हैं यह चक्र तीन-चार भर चलता रहता है. लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में जाड़ों में यह पौधा अत्यधिक ठण्ड की वजह से पूरा मर जाता है.
क्या है काले धतूरे का महत्व और उपयोग
काला धतूरा, जिसे आयुर्वेद में एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा माना जाता है, यही नहीं इसका धार्मिक और पूजा अनुष्ठान में एक महत्वपूर्ण रोल रहा है . काले धतूरे को अब वैज्ञानिक शोध में भी फायदेमंद साबित हो रहा है. हालांकि इसे जहरीला माना जाता है, लेकिन नियंत्रित मात्रा में और सही तरीके से इसका उपयोग कई बीमारियों के इलाज में किया जा सकता है.
रिसर्च जर्नल ऑफ फार्माकोलॉजी एंड फार्माकोडायनामिक्स (आरजेपीपीडी) के शोध में पाया गया कि काले धतूरे में एंटी-बैक्टीरियल, एंटी-इंफ्लेमेटरी और एनाल्जेसिक (दर्द निवारक) गुण होते हैं, जो विभिन्न रोगों के इलाज में सहायक हो सकते हैं. काले धतूरे के बीज और पत्तों का धुआं दमा (अस्थमा) और ब्रोंकाइटिस जैसी सांस संबंधी समस्याओं में राहत दे सकता है. इसमें मौजूद प्राकृतिक तत्व सिरदर्द, जोड़ों के दर्द और गठिया जैसी समस्याओं में राहत दिलाने में सहायक हो सकते हैं.
पारंपरिक चिकित्सा में फोड़े-फुंसी, खुजली और त्वचा संक्रमण के इलाज के लिए इसका उपयोग किया जाता है. शोध में भी पाया गया कि इसमें एंटी-फंगल और एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, जो त्वचा रोगों में फायदेमंद हो सकते हैं. काले धतूरे के कुछ तत्व मांसपेशियों को आराम देने और ऐंठन को कम करने में मदद करते हैं. आयुर्वेद में इसे पाचन सुधारने, बुखार कम करने और संक्रामक रोगों से बचाव के लिए उपयोग किया जाता रहा है. आरजेपीपीडी के शोध के अनुसार, धतूरे के पत्तों का स्वाद कड़वा होता है और धतूरे के बीजों जैसी ही गंध होती है. इसका उपयोग एनोडीन और एंटीस्पास्मोडिक के रूप में भी किया जाता है. यह पौधा तीखा, मादक, दर्द निवारक, ऐंठन-रोधी, नशीला और उल्टी लाने वाला होता है. यह कई प्रकार की बीमारियों में फायदेमंद है. काले धतूरे को सजावटी पौधे के रूप में भी विशिष्ठ स्थान प्राप्त है, प्राचीन काल में शिवालयों में काले धतूरे को जरूर लगाए जाने का भी वर्णन है.
