विलुप्त होती परंपरा: खत्म होने की कगार पर ‘घुत्तू’ से कपड़े धोने की संस्कृति

Traditional method of washing clothes in Uttarakhand

 

रीठा और क्वार पात थे कभी पहाड़ का प्राकृतिक सर्फ, आधुनिकता की दौड़ में गुम होती विरासत

  • नीरज उत्तराखंडी

पहाड़ों की पारंपरिक जीवनशैली आत्मनिर्भरता और प्रकृति के साथ संतुलन की अनूठी मिसाल रही है. इसी जीवन पद्धति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था ‘घुत्तू’—कपड़े धोने का एक देसी और पर्यावरण अनुकूल तरीका, जो आज आधुनिक वाशिंग मशीनों और रासायनिक डिटर्जेंट के बीच धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंच गया है.

क्या होता थाघुत्तू’?

‘घुत्तू’ लकड़ी या पत्थर से बना एक पारंपरिक उपकरण होता था, जिसमें कपड़ों को पानी में भिगोकर डंडों या हाथों से पीट-पीटकर साफ किया जाता था. यह तरीका न केवल प्रभावी था, बल्कि पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल भी माना जाता था.

रीठा और क्वार पात: प्राकृतिक सर्फ

आज जहां बाजार में केमिकल डिटर्जेंट का बोलबाला है, वहीं पहले कपड़े धोने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल होता था.

  • रीठा (सोपनट): इसके छिलकों को पानी में घोलने पर झाग बनता था, जो प्राकृतिक क्लीनिंग एजेंट की तरह काम करता था.
  • क्वार पात: यह कपड़ों की सफाई के साथ-साथ उन्हें मुलायम भी बनाता था.

ये दोनों ही साधन त्वचा के लिए सुरक्षित और जल स्रोतों के लिए पूरी तरह हानिरहित थे.

क्यों खत्म हो रही है यह परंपरा?

विशेषज्ञों और स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं—

  • वाशिंग मशीन और डिटर्जेंट का बढ़ता उपयोग
  • समय की कमी और बदलती जीवनशैली
  • नई पीढ़ी का पारंपरिक ज्ञान से दूर होना
  • सुविधाभोगी जीवन की ओर बढ़ता झुकाव

गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले महिलाएं सामूहिक रूप से नदी या धारों के किनारे ‘घुत्तू’ से कपड़े धोती थीं, जिससे सामाजिक मेलजोल भी बढ़ता था.

पर्यावरण पर प्रभाव

रासायनिक डिटर्जेंट के बढ़ते उपयोग से जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं. ऐसे में ‘घुत्तू’ और रीठा जैसे प्राकृतिक विकल्प आज के समय में फिर से प्रासंगिक साबित हो सकते हैं.

क्या हो सकता है समाधान?

  • पारंपरिक तरीकों को स्कूलों और सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल किया जाए
  • रीठा और अन्य प्राकृतिक उत्पादों को बाजार में बढ़ावा दिया जाए
  • स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जाएं
  • ‘इको-फ्रेंडली’ जीवनशैली को प्रोत्साहित किया जाए

संदेश

‘घुत्तू’ और रीठा से कपड़े धोने की परंपरा केवल एक घरेलू तरीका नहीं, बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है. यदि समय रहते इस विरासत को संरक्षित नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इसे केवल किताबों और किस्सों में ही जान पाएंगी.

 

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