Tag: श्रीकृष्ण

अस्तित्व की व्याप्ति का उत्सव है होली

अस्तित्व की व्याप्ति का उत्सव है होली

लोक पर्व-त्योहार
होली पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  प्रकृति के सौंदर्य और शक्ति के साथ अपने हृदय की अनुभूति को बाँटना बसंत ऋतु का तक़ाज़ा है. मनुष्य भी चूँकि उसी प्रकृति की एक विशिष्ट कृति है इस कारण वह इस उल्लास से अछूता नहीं रह पाता. माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को वसंत की आहट मिलती है. परम्परा में वसंत को कामदेव का पुत्र कहा गया है इसलिए उसके जन्म के साथ इच्छाओं और कामनाओं का संसार खिल उठता है. फागुन और चैत्त के महीने मिल कर वसंत ऋतु बनाते हैं. वसंत का वैभव पीली सरसों, नीले तीसी के फूल, आम में मंजरी के साथ, कोयल की कूक प्रकृति सुंदर चित्र की तरह सज उठती है. फागुन की बयार के साथ मन मचलने लगता है और उसका उत्कर्ष होली के उत्सव में प्रतिफलित होता है. होली का पर्व वस्तुतः जल, वायु, और वनस्पति से सजी संवरी नैसर्गिक प्रकृति के स्वभाव में उल्लास का आयोजन है. रंग, गुलाल और अबीर से एक दूसरे को...
चमत्कार: ऐसा मंदिर जहां भूख से दुबले हो जाते हैं श्रीकृष्ण!

चमत्कार: ऐसा मंदिर जहां भूख से दुबले हो जाते हैं श्रीकृष्ण!

धर्मस्थल
निम्मी बुड़ाकोटी यह विश्व का ऐसा अनोखा मंदिर है जो 24 घंटे में मात्र दो मिनट के लिए बंद होता है. यहां तक कि ग्रहण काल में भी मंदिर बंद नहीं किया जाता है. कारण यह कि यहां विराजमान भगवान कृष्ण को हमेशा तीव्र भूख लगती है. भोग नहीं लगाया जाए तो उनका शरीर सूख जाता है. अतः उन्हें हमेशा भोग लगाया जाता है, ताकि उन्हें निरंतर भोजन मिलता रहे. साथ ही यहां आने वाले हर भक्त को भी प्रसादम् (प्रसाद) दिया जाता है. बिना प्रसाद लिये भक्त को यहां से जाने की अनुमति नहीं है. मान्यता है कि जो व्यक्ति इसका प्रसाद जीभ पर रख लेता है, उसे जीवन भर भूखा नहीं रहना पड़ता है. श्रीकृष्ण हमेशा उसकी देखरेख करते हैं. लोक मान्यता के अनुसार कंस वध के बाद भगवान श्रीकृष्ण बुरी तरह से थक गए थे. भूख भी बहुत अधिक लगी हुई थी. उनका वही विग्रह इस मंदिर में है. इसलिए मंदिर सालों भर हर दिन मात्र खुला रहता है. मंदिर बंद करने का...
 सबके और सबसे परे: अतिक्रामी श्रीकृष्ण

 सबके और सबसे परे: अतिक्रामी श्रीकृष्ण

लोक पर्व-त्योहार
जन्माष्टमी (30 अगस्त) पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  भारतीय जीवन में आस्था के सजीव आधार because भगवान श्रीकृष्ण के जितने नाम और रूप हैं वे मनुष्य की कल्पना की परीक्षा लेते से लगते हैं. देवकीसुत, यदुनंदन, माधव, मुकुंद, केशव, श्याम, गोपाल, गोपिका-वल्लभ, गोविन्द, अच्युत, दामोदर, मोहन, यशोदानंदन, वासुदेव, राधावर, मधुसूदन, गोवर्धनधारी, कन्हैया, नन्द-नंदन, मुरारी, लीला-पुरुषोत्तम, बांके-बिहारी, मुरलीधर, लालबिहारी, वनमाली, वृन्दावन-विहारी आदि सभी नाम ख़ास-ख़ास देश-काल से जुड़े हुए हैं और उनके साथ-साथ जुडीं हुई हैं अनेक रोचक और मर्मस्पर्शी कथाएँ जो श्रीकृष्ण की अनेकानेक छवियों की सुधियों में सराबोर करती चलती हैं. संसाधनों पूरे भारत में साहित्य, लोक-कला, संगीत, नृत्य, चित्र-कला, तथा स्थापत्य सभी क्षेत्रों में श्रीकृष्ण की अमिट छाप देखी जा सकती है. चित्रों में माखन चोर बाल श्रीकृष्ण, मोर पंख, क...