Tag: फूलदेई

CM धामी से मिले मैठाणी, 8वीं तक अवकाश घोषित करने की मांग, भेंट की फूलों की टोकरी

CM धामी से मिले मैठाणी, 8वीं तक अवकाश घोषित करने की मांग, भेंट की फूलों की टोकरी

उत्तराखंड हलचल
देहरादून: समाज सेवी एवं फूलदेई संरक्षण अभियान के संस्थापक शशि भूषण मैठाणी की लगातार 21 वर्षो की लम्बी मुहीम के बाद उत्तराखंड का खूबसूरत बालपर्व फूलदेई अब प्रदेश के अलावा देश विदेश तक प्रवासियों के बीच चर्चित व लोकप्रिय हो गया है। सीमांत जनपद चमोली के जिलामुख्यालय गोपेश्वर सहित वहां आसपास के दर्जनभर गांवों से फूलदेई त्यौहार को पुर्नजीवित करने का जो अभियान उन्होंने वर्ष 2004 से शुरू किया उसका असर यह हुआ, कि विगत वर्ष मुख्यमंत्री पुष्कर धामी नें इस पर्व को हर वर्ष बाल पर्व के रूप में मनाने का एलान कर दिया था।  आज उसी क्रम में फूलदेई संरक्षण मुहीम के संस्थापक शशि भूषण मैठाणी नें आज मुख्यमंत्री आवास में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मुलाक़ात कर उनका विशेष आभार भी व्यक्त किया। मैठाणी नें कहा कि वर्ष 2004 में उन्होने गोपेश्वर से खूबसूरत पर्व फूलदेई फूल फूल माई को पुर्नजीवित करने का जो अभियान आर...
फूलों का उत्सव: सांझा चूल्हा और ग्वाल पुजै 

फूलों का उत्सव: सांझा चूल्हा और ग्वाल पुजै 

लोक पर्व-त्योहार
मंजू दिल से… भाग-28 मंजू काला फूल से मासूम बच्चे, ताजे फूलों सी उनकी मुस्कराहट, पहाड़ी  झरने सी उनकी चाल,  दूर  पहाड़ी में बजती मंदिर की घंटियां मासूम नन्हें—नन्हें हाथों में सजी खूबसूरत रिंगाल की छोटी-छोटी टोकरियां और प्यारे से उत्तराखंड का प्यारा सा उत्सव “फूलदेई” जी हां, दुनिया में शायद उत्तराखंड के पहाड़ों में ही ऐसा उत्सव मनाया जाता है, जो रंग—बिरंगे फूलों और प्यारे से मासूम बच्चों के साथ मनाया जाता है. रिंगाल की खुबसूरत टोकररियों में पुलम, खुबानी बुरंस, फ्योंली,आडू़,और न जाने कितने रंग—बिरंगे फूल लेकर आते हैं ये मासूम बच्चे. और हर घर की देहरी पर ये खूबसूरत फूल बिखेरते हैं. मुँह अंधेरे में जागकर जंगलों से लाल सुर्ख बुराँश के फूल चून—चून कर लाते हैं औऱ फिर खेतों की मुंडेर से सूरज की किरणों की तरह मुस्कराती सरसों—सी पीली फ्योंली को अपनी टोकिरयों में सजा कर निकल जाती है स्कूलि...
प्रकृति व संस्कृति के समन्वित उल्लास का पर्व है फूल संगरांद

प्रकृति व संस्कृति के समन्वित उल्लास का पर्व है फूल संगरांद

लोक पर्व-त्योहार
बीना बेंजवाल, साहित्यकार चैत्र संक्रांति का पर्व प्रकृति व संस्कृति के समन्वित उल्लास से मन को अनुप्राणित कर देता है. बचपन की दहलीज से उठते हुए मांगलिक स्वर बुरांशों से लकदक जंगलों से होते हुए जब उत्तुंग हिमशिखरों को छूने लगते हैं तो मन को आवेष्टित किए हुए क्षुद्रताओं एवं संकीर्णताओं के कलुष वलय छंटने लगते हैं. ये लोकपर्व एक वृक्ष दृष्टि के साथ न केवल अपनी जड़ों से जोड़ता है वरन् लोकमंगल की ऊर्ध्वमुखी सोच से भी समृद्ध करता है. अपनी फुलकण्डियाँ लिए घर के बाहर खड़े नन्हें फुलारियों का संबोधन भीतर की तमाम जड़ता को तोड़ हर देहली-द्वार पर फूलों के साथ आत्मीय रिश्तों की भी एक रंगोली सजाने लगता है. सांस्कृतिक संपदा एवं प्राकृतिक सौंदर्य की धनी उत्तराखण्ड की यह धरती चैत्र संक्रांति पर फूल संगरांद या फूलदेई का अपना लोकपर्व कुछ इसी अंदाज में मनाती है. वैसे तो इस राज्य के हर पर्व, त्योहार एवं उत्सव की ...
‘फूल संगराँद’ से शुरु होकर ‘अर्द्ध’ से होते हुए ‘साकुल्या संगराँद’ तक चलता रहता है उत्सव

‘फूल संगराँद’ से शुरु होकर ‘अर्द्ध’ से होते हुए ‘साकुल्या संगराँद’ तक चलता रहता है उत्सव

लोक पर्व-त्योहार
सदंर्भ : फूलदेई दिनेश रावत वसुंधरा के गर्भ से प्रस्फुटित एक—एक नवांकुर चैत मास आते—आते पुष्प—कली बन प्रकृति के श्रृंगार को मानो आतुर हो उठते हैं. खेतों में लहलहाती गेहूँ—सरसों की because फसलों के साथ ही गाँव—घरों के आस—पास पयां, आड़ू, चूल्लू, सिरौल, पुलम, खुमानी के श्वेत—नीले—बैंगनी, खेत—खलिहानों के मुंडैरों से मुस्कान बिखेरती प्यारी—सी फ्योंली के पीले फूल और बांज, बुराँश, खर्सू, मोरू, अंयार की हरियाली के बीच से अद्वितीय लालिमा का संचार करते बुराँश के सुर्ख लाल फूलों की उन्मुक्त मुस्कान और अनुपम सौंदर्य देखते ही बनती है. उत्तराखंड प्रकृति के इसी मनोरम दृश्य को देखकर उसी के निकटव नैकट्य में जीवन यापन करने वाला सीधा—सच्चा—सरल because लोक मानस इस प्रकार आनंदित—उत्साहित—उल्लासित हो उठता है कि उसके मन में भी जीवन को ऐसे ही अद्भुत व अनुपम बनाने की उत्कंठा जाग उठती है. फलतः प्रकृति प्...
प्रकृति का लोकपर्व फूलदेई

प्रकृति का लोकपर्व फूलदेई

लोक पर्व-त्योहार
चन्द्रशेखर तिवारी मनुष्य का जीवन प्रकृति के साथ अत्यंत निकटता से जुड़ा है। पहाड़ के उच्च शिखर, पेड़-पौंधे, फूल-पत्तियां, नदी-नाले और जंगल में रहने वाले सभी जीव-जन्तुओं के साथ because मनुष्य के सम्बन्धों की रीति उसके पैदा होने से ही चलती आयी है। समय-समय पर मानव ने प्रकृति के साथ अपने इस अप्रतिम साहचर्य को अपने गीत-संगीत और रागों में भी उजागर करने का प्रयास किया है। उत्तराखंड पीढ़ी-दर-पीढ़ी अनेक लोक so गीतों के रुप में ये गीत समाज के सामने पहुंचते रहे। उत्तराखण्ड के पर्वतीय लोकगीतों में वर्णित आख्यानों को देखने से स्पष्ट होता है कि स्थानीय लोक ने प्रकृति में विद्यमान तमाम उपादानों यथा ऋतु चक्र,पेड़-पौधों, पशु-पक्षी,लता,पुष्प तथा नदी व पर्वत शिखरों को मानवीय संवेदना से जोड़कर उसे महत्वपूर्ण स्थान दिया है। उत्तराखंड लोकगीतों वर्णित बिम्ब एक अलौकिक but और विशिष्ट सुख का आभास कराते ह...
वक्त के साथ ‘फूलदेई’ भी बदल गई

वक्त के साथ ‘फूलदेई’ भी बदल गई

लोक पर्व-त्योहार
ललित फुलारा टोकरी और भकार- दोनों ही छूट गया. बुरांश और फ्योली भी आंखों से ओझल हो गई. बस स्मृतियां हैं जिन्हें ईजा, आंखों के आगे उकेर देती है. देहरी पर सुबह ही फूल रख दिए गए हैं. ईजा के साथ-साथ हम because भी बचपन में लौट चले हैं. तीनों भाई-बहन के हाथों में टोकरी है. टोकरी में बुरांश, फ्योली, आड़ू so और सरसों के फूल. गुड़ की ढेली और मुट्ठी भर चावल. गोद में परिवार में जन्मा नया बच्चा जिसकी पहली फूलदेई है. तलबाखई से लेकर मलबाखई तक हर घर में हम बच्चों की कितनी आवोभगत हो रही है. तन-मन में स्फूर्ती but भरती वसंत की ठंडी हवा में उल्लासित हमारा मन, अठन्नी और चवन्नी की गिनती के साथ ही गुड़ के ढेले में रमा हुआ है. पैसों की खनखनाहट के साथ ही हमारे सपने भी खनक रहे हैं. बहन के बालों में फ्योली का फूल लहलहा रहा है. भाई का मन गुड़ और मिठाई में रमा हुआ है. हर धैली पर फ्योली का फूल चढ़ा...
दैंणी द्वार भरे भकार

दैंणी द्वार भरे भकार

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—7 प्रकाश उप्रेती मिट्टी और गोबर से लीपा, लकड़ी के फट्टों से बना ये- 'भकार' है. भकार (कोठार) के अंदर अमूमन मोटा अनाज रखा जाता था. इसमें तकरीबन 200 से 300 किलो अनाज आ जाता था. गाँव में अनाज का भंडारण, भकार में ही किया जाता था. साथ ही भकार कमरे के पार्टीशन का काम भी करता था. पहाड़ के घरों के अंदर का एस्थेटिक्स भकार से भी बनता था. भकार का होना समृद्धि का सूचक भी था. तब खूब खेती होती थी और इतने जंगली जानवर भी नहीं थे. खूब सारा अनाज हुआ करता था. इतना सारा अनाज खुले में रख नहीं सकते थे इसलिए हर घर में भकार रखना आवश्यक वस्तु थी. हमारे घर में दो भकार थे: एक में धान और दूसरे में मंडुवा रखा रहता था. ईजा धान और मंडुवा साफ करने के बाद, 'सुखा-पका' कर भकार में रख देती थीं. जब धान और मंडुवा कम हुआ तो फिर बाजार से गेहूं लाकर वो रखा जाने लगा. अब तो जो लोग खेती कर भी...