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साहित्‍य-संस्कृति

ऐश्वर्य और सहज आत्मीयता की अभिव्यक्ति श्रीराम

राम नवमी पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  सनातनी यानी सतत वर्त्तमान की अखंड अनुभूति के लिए तत्पर मानस वाला भारतवर्ष का समाज देश-काल में स्थापित और सद्यः अनुभव में ग्राह्य सगुण प्रत्यक्ष को परोक्ष वाले व्यापक और सर्व-समावेशी आध्यात्म से जुड़ने का माध्यम because बनाता है. वैदिक चिंतन से ही व्यक्त और
धर्मस्थल

काशी विश्वनाथ परिसर लोकार्पण: जीवंत संस्कृति नगरी काशी

काशी विश्वनाथ परिसर के लोकार्पण (13 दिसंबर) पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  अर्ध चंद्राकार उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर बसी काशी या ‘बनारस’ को सारी दुनिया से न्यारी नगरी कहा गया है. काल के साथ अठखेलियाँ करता यह नगर धर्म, शिक्षा, संगीत, साहित्य, कृषि, because और उद्योग-धंधे यानी संस्कृति और सभ्यता  के हर  पक्ष में […]
साहित्‍य-संस्कृति

स्वदेशी से स्वाधीनता और सामर्थ्य का आवाहन  

प्रो. गिरीश्वर मिश्र  ‘देश’ एक विलक्षण शब्द है. एक ओर तो वह स्थान को बताता है तो दूसरी ओर दिशा का भी बोध कराता है और गंतव्य लक्ष्य की ओर भी संकेत करता है. देश धरती भी है जिसे वैदिक काल में because मातृभूमि कहा गया और पृथ्वी सूक्त में ‘माता भूमि: पुत्रोहं पृथिव्या:’ की […]
साहित्‍य-संस्कृति

हिन्दी बने व्यवहार और ज्ञान की भाषा

प्रो. गिरीश्वर मिश्र  अक्सर भाषा को संचार और अभिव्यक्ति के एक प्रतीकात्मक माध्यम के रूप ग्रहण किया जाता है.  यह स्वाभाविक भी है. हम अपने विचार, सुख-दुख के भाव और दृष्टिकोण दूसरों तक मुख्यत: भाषा द्वारा ही पहुंचाते हैं और संवाद संभव होता है. निश्चय ही यह भाषा की बड़ी भूमिका है परंतु इससे भाषा […]
लोक पर्व-त्योहार

प्रकाश पर्व है जीवन का आमंत्रण

दीपावली पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  लगभग दो सालों से चली आती कोविड की महामारी ने सबको यह बखूबी जना दिया है कि जगत नश्वर है और जीवन और दुनिया सत्य से ज्यादा आभासी है. ऎसी दुनिया में आभासी because (यानी वर्चुअल!) का राज हो तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. सो अब आभासी दुनिया […]
साहित्‍य-संस्कृति

संत कबीर दास का गुरु स्मरण

गुरु पूर्णिमा (24 जुलाई) पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  निर्गुण संत परम्परा के काव्य में गुरु की महिमा पर विशेष ध्यान दिया गया है और शिष्य या साधक के उन्नयन में उसकी भूमिका को बड़े आदर से देखा गया है. गुरु को ‘सद्गुरु’ भी कहा गया है और सद्गुरु को ईश्वर या परमात्मा के रूप […]
शिक्षा

अब शिक्षा तरह-तरह के बंधन की तरफ ले जाती है!

बदलता शैक्षिक परिदृश्य प्रो. गिरीश्वर मिश्र शिक्षा का मूल्य इस अर्थ में  जगजाहिर है कि व्यापार, स्वास्थ्य, सामरिक तैयारी, यातायात, संचार, कृषि, नागरिक सुरक्षा यानी जीवन कोई भी  क्षेत्र लें उसमें  हमारी प्रगति so सिर्फ और  सिर्फ इसी  बात पर टिकी हुई है कि हम ज्ञान की दृष्टि से कहाँ पर स्थित हैं. हम अपना और […]
योग-साधना

योग ही है आज का युग धर्म

विश्व योग दिवस (21 जून) पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र योग का शाब्दिक अर्थ सम्बन्ध (या जोड़ ) है और उस सम्बन्ध की परिणति भी. इस तरह जुड़ना , जोड़ना, युक्त होना, संयुक्त होना  जैसी प्रक्रियाएं योग कहलाती हैं जो शरीर, मन और सर्वव्यापी चेतन तत्व के बीच सामंजस्य स्थापित करती हैं. कुल मिला कर […]
शिक्षा

मातृभाषा और शिक्षा का लोकतंत्रीकरण

मातृभाषा दिवस (22 फ़रवरी) पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र मनुष्य इस अर्थ में भाषाजीवी कहा जा सकता है कि उसका सारा जीवन व्यापार भाषा के माध्यम से ही होता है. उसका मानस भाषा में ही बसता है और उसी से रचा जाता है.because दुनिया के साथ हमारा रिश्ता भाषा की मध्यस्थता के बिना अकल्पनीय है. […]
सेहत

मानसिक स्वास्थ्य के लिए चाहिए शान्ति और सौहार्द

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस (10 अक्टूबर) पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र बचपन से यह कहावत सुनते आ because रहे हैं “जब मन चंगा तो कठौती में गंगा” यानी यदि मन प्रसन्न हो तो अपने पास जो भी थोड़ा होता है वही पर्याप्त होता है.  पर आज की परिस्थितियों मन चंगा नहीं हो पा रहा है […]