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संस्मरण

ढाई दिन के झोंपड़े की तरह ढाई दिन का प्यार!

घट यानी पनचक्की (घराट) डॉ. हरेन्द्र सिंह असवाल पिछली सदी की बात है. उनके लिए जिन्होंने ये देखा नहीं, लेकिन हमारे लिए तो जैसे कल की बात है कि हम रविवार को पीठ में तीस पैंतीस किलो गेहूं, जौ  लादकर घट जा रहे हैं. दूर से ही देख रहा हूँ जैसे घट का पानी टूटा […]
साहित्‍य-संस्कृति

पहाड़ों से विलुप्त होते घराट…

खजान पान्डे परम्परागत तौर पर पहाड़ के लोगों की वैज्ञानिक सोच और दृष्टिकोण को देखना हो तो घराट जिसे घट भी कहा जाता है एक नायाब नमूना है. आधुनिकता की दौड़ में पहाड़ so और इसकी जीवनशैली से जुड़ी कुछ चीजें जो लगभग समाप्ति की और हैं उनमें घराट प्रमुख है. यूँ तो आज घर-घर […]