October 20, 2020
साहित्यिक हलचल

सुन रहे हो प्रेमचंद! मैं विशेषज्ञ बोल रहा हूँ

  • प्रकाश उप्रेती

पिछले कई दिनों से आभासी दुनिया की दीवारें प्रेमचंद के विशेषज्ञों से पटी पड़ी हैं. इधर तीन दिनों से तो तिल भर रखने की जगह भी नहीं बची है. एक से बढ़कर एक विशेषज्ञ हैं. नवजात से लेकर वयोवृद्ध विशेषज्ञों की खेप आ गई है. गौर से देखने पर मालूम हुआ कि इनमें तीन तरह के विशेषज्ञ हैं. वैसे तीनों कोटि के विशेषज्ञ नाभिनालबद्ध हैं. अंतर बस आभा में है. तीनों की अंतरात्मा जोर देकर यही कहती है- प्रेमचंद पर भी पढ़ना पड़ेगा क्या? उन पर तो बोला जा सकता है. इस भाव के साथ ये प्रेमचंद की आत्म को बैकुण्ठ देने मैदान में उतर आते हैं. इन तीन कोटि के विशेषज्ञों के बारे में थोड़ा जान लें-

इनमें पहली कोटि के विशेषज्ञ वो हैं जिन्होंने सालों- साल से प्रेमचंद की कोई कहानी तक नहीं पढ़ी है. ये प्रथम कोटि के विशेषज्ञ हैं. ये पूर्वज्ञान के बल पर ही प्रेमचंद को निपटा देते हैं. यह कोई पहला मौका तो है नहीं. ये तो कई वर्षों से निपटाते आ रहे हैं. आज के दिन तो ये हाई-डिमांड में रहते हैं. ऐसे विशेषज्ञों की आज के दिन के लिए 15 दिन पहले से ही प्री-बुकिंग स्टार्ट हो जाती है. आज वह 7 जगह प्रेमचंद पर बोलेंगे. इन सातों जगह जो विषय रखे गए हैं उनमें बस सर्वनाम का अंतर है. सर्वनाम में ही सर्वनाश है.

दूसरी कोटि के वो विशेषज्ञ हैं जो प्रेमचंद की 2 कहानी और 2 उपन्यासों को सालों से पढ़ाते आ रहे हैं. इसके अतिरिक्त की कभी उन्हें जरूरत भी नहीं पड़ी. इसी को भले मानुष ने ‘गागर में सागर’ कहा है. इनकी बुकिंग भी 5 दिन पहले से हो जाती है. इस कोटि के विशेषज्ञों की एक बड़ी भारी विशेषता यह है कि ये अपने और संगोष्ठी के विषय का चुनाव स्वयं ही करते हैं. इनको प्रेमचंद के यहाँ- किसान त्रासदी, प्रेमचंद में प्रगतिशीलता,  प्रेमचंद की कहानियों में दलित चेतना, ज़मींदारी व्यवस्था में पिसता होरी, रंगभूमि के सूरदास का संघर्ष , प्रेमचंद में आदर्शवाद और यथार्थवाद का द्वंद, यह सब देखना होता है. यही बातें सालों से प्रश्नपत्र के तौर पर भी उड़ेली जाती रही हैं. अब इनपर नहीं तो किस पर बोला जाएगा, हां… बोलो…

उनको पहला उपन्यास कब आया था से लेकर अंतिम अधूरे उपन्यास को किसने और कब पूरा किया था तक का सन् याद होता है. इसके अतिरिक्त उन्होंने कुछ पंच लाइन गुरु जी के व्याख्यान से भी सुन रखी होती हैं. ऐसे नवजात विशेषज्ञों की बुकिंग तत्काल में होती है. इनको तत्काल में बुक करके, ट्रेन खुलने का समय दे दिया जाता है.

तीसरी कोटि नवजातों की है जिन्होंने प्रेमचंद की 1 कहानी और 1 उपन्यास को सिलेबस के तौर पर पढ़ा है. बाकी नेट के ऑब्जेक्टिव प्रश्न के रूप में सन् याद किए हुए हैं. वह भी क्रम से. उनको पहला उपन्यास कब आया था से लेकर अंतिम अधूरे उपन्यास को किसने और कब पूरा किया था तक का सन् याद होता है. इसके अतिरिक्त उन्होंने कुछ पंच लाइन गुरु जी के व्याख्यान से भी सुन रखी होती हैं. ऐसे नवजात विशेषज्ञों की बुकिंग तत्काल में होती है. इनको तत्काल में बुक करके, ट्रेन खुलने का समय दे दिया जाता है. इनके चेहरे की गंभीरता, कुर्ते का रंग, ललाट की चमक, वाणी का भारीपन, शब्दों में गुरुवंदना पहली कोटि के विशेषज्ञों का भी पसीना छुड़वा देती है. उनको भी रश्क होने लगता है. काश ! मैं … भी…

इस वर्ष की पीड़ा तो और बड़ी है. इस बार प्रेमचंद पर कोरोना का असर भी पड़ा है. तीनों कोटि के विशेषज्ञों को इससे भी निपटना है. उनके लिए विषय चुनौती भरे हैं. वैसे विशेषज्ञों को इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है. वह भी तो जानते हैं कि प्रेमचंद के नाम पर सब चल जाता है. कौन सा किसी ने प्रेमचंद को पूरा पढ़ा ही होगा. फिर प्रेमचंद का अनकहा भी तो बहुत कुछ है. उसमें कोरोना के संदर्भ में भी तो  होगा ही.

इस वर्ष की पीड़ा तो और बड़ी है. इस बार प्रेमचंद पर कोरोना का असर भी पड़ा है. तीनों कोटि के विशेषज्ञों को इससे भी निपटना है. उनके लिए विषय चुनौती भरे हैं. वैसे विशेषज्ञों को इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है. वह भी तो जानते हैं कि प्रेमचंद के नाम पर सब चल जाता है. कौन सा किसी ने प्रेमचंद को पूरा पढ़ा ही होगा. फिर प्रेमचंद का अनकहा भी तो बहुत कुछ है. उसमें कोरोना के संदर्भ में भी तो  होगा ही. वैसे भी गुरु जी ने एक दिन पहले प्रेमचंद पर दिए व्याख्यान में कहा था कि- “कालजयी लेखक वही होता है जो अपने साहित्य में भविष्य को दर्ज कर दे और जिसमें सबके लिए कुछ न कुछ हो”. फिर प्रेमचंद जैसे बडे लेखक ने कोरोना पर न लिखा हो, ऐसा हो ही नहीं सकता है. इसलिए ‘बोल ही दूंगा’. विषय जो होगा देख लिया जाएगा. बोलना तो मुझे है. प्रेमचंद पर बोलना कौन सी मुश्किल बात है. इस आत्मविश्वास के साथ नवजात से लेकर वयोवृद्ध विशेषज्ञ तक मैदान में कूद पड़ते हैं.

इस बार के विषय इतनी मौलिकता लिए हुए हैं कि प्रेमचंद की आत्मा को मुक्ति मिलना तय मान लो. विशेषज्ञ भी निपटा देने की पूरी तैयारी में हैं. विषय के कुछ नमूने-

 ‘प्रेमचंद का साहित्य और कोरोना’
‘प्रेमचंद के साहित्य में महामारी’
‘कोरोना के परिप्रेक्ष्य में प्रेमचंद का साहित्य’
‘प्रेमचंद होते तो लॉक डाउन में क्या लिखते’
‘आत्मनिर्भर भारत और प्रेमचंद’
‘प्रेमचंद के साहित्य में आत्मनिर्भरता का संदर्भ’
‘प्रेमचंद की कहानियों में ज्वर’
‘प्रेमचंद के साहित्य में वर्णित बीमारियां’.

इन विषयों के अतिरिक्त भी कई विषय हैं. प्रेमचंद पर विषयों की और विशेषज्ञों की कमी थोड़ा न है…

इस तरह प्रेमचंद सबके हो जाते हैं. प्रेमचंद न होते तो क्या होता? यह सवाल तो बकवास है लेकिन प्रेमचंद के होने से भी क्या हो गया? प्रेमचंद न भी होते तब भी प्रेमचंद के विशेषज्ञों की तीनों कोटियाँ होती. न होने पर हो सकता है कुछ और कोटियाँ हो जातीं. वैसे भी अब प्रेमचंद बचे ही कितने हैं !

‘अब बिगाड़ के डर से ईमान की बात’ नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे. आज इस पंक्ति की गूँज भी आभासी मंडल में बहुत सुनाई देगी. तभी बात प्रेमचंद तक पहुँच पाएगी.

सुन रहे हो प्रेमचंद…

जयंती मुबारक

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं।)

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *