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जयंत चौधरी ने चंद घंटे में ही ठुकराया अमित शाह का ऑफर, जाट वोट क्यों है अहम?

देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव (Assembly Elections 2022) के लिए प्रचार चल रहा है. सभी पार्टियां इन चुनावों में अपनी पकड़ को मजबूत करने की मुहिम में जुटी हैं. इन पांच प्रदेशों में सबसे अहम है उत्तर प्रदेश. यूपी इसलिए अहम है क्योंकि दिल्ली की कुर्सी का रास्ता यहीं से निकलता है. इसलिए समय रहते यूपी (UP Election 2022) में अपनी तैयारियों को पुख्ता करने के लिए सभी दल कोशिश कर रहे हैं. इसी कोशिश के तहत बुधवार को दिल्ली में गृहमंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने यूपी के जाट नेताओं से मुलाकात की. इस मुलाकात का पश्चिमी यूपी की सियासी तस्वीर से क्या रिश्ता है, पहले हम आपको यही बताते हैं.

वेस्ट यूपी में इस पार कांटे की टक्कर इसलिए बताई जा रही है क्योंकि समाजवादी पार्टी और आरएलडी के गठबंधन ने बीजेपी के सियासी गणित को काफी हद तक बिगाड़ने की कोशिश की है. जाट और मुस्लिम का गठजोड़ बनाकर अखिलेश यादव और जयंत चौधरी बीजेपी के वर्चस्व को चुनौती देने की कोशिश कर रहे हैं. इसलिए एक बार फिर नाराज जाट वोटर्स को समझाने के लिए अमित शाह ने कमान संभाली है. साल 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले भी अमित शाह ने जाट नेता बीरेंद्र सिंह के घर पर जाट समुदाय के नेताओं से मुलाकात की थी, जिसके बाद ‘जाटलैंड’ में भगवा का परचम लहराया था. इस बार ये मुलाकात कितना कारगर साबित होती है, इसे जानने के लिए नतीजों का इंतजार करना होगा.

जब अमित शाह दिल्ली में बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा के घर पर 250 से ज्यादा जाट नेताओं के साथ बैठक कर रहे थे, तो उन्होंने इशारों में ही सही जयंत चौधरी को बीजेपी गठबंधन में शामिल होने का ऑफर दे दिया. गृह मंत्री अमित शाह ने बैठक में कहा कि चौधरी चरण सिंह की हम इज्जत करते हैं. उनकी विरासत के लिए हमने पहले भी दरवाजे खोल रखे थे और यदि आगे भी वो चाहेंगे तो उनसे बातचीत के लिए दरवाजे खुले रहेंगे.

बीजेपी के ऑफर पर चार घंटे में ही जयंत चौधरी की भी प्रतिक्रिया सामने आई. उन्होंने ट्वीट कर कहा कि, “…न्योता मुझे नहीं, उन 700 प्लस किसान परिवारों को दो जिनके घर आपने उजाड़ दिए.” इस क्षेत्र में राष्ट्रीय लोक दल का खासा प्रभाव है. जयंत के दादा चौधरी चरण सिंह देश के प्रधानमंत्री रह चुके हैं जबकि उनके पिता दिवंगत अजीत सिंह भी केंद्र सरकार में मंत्री रहे हैं.

पश्चिमी यूपी के आंकड़ों को समझिए

ऐसे में अब आप समझिए कि पहले कैराना से चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत और अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट नेताओं के साथ बैठक और जयंत चौधरी को ऑफर. ये बताने के लिए काफी है कि बीजेपी पश्चिम उत्तर प्रदेश और जाटों को कितनी तवज्जो दे रही है. पश्चिम उत्तर प्रदेश में बीजेपी की क्या रणनीति है और जाटों पर फोकस क्यों है, इसको समझने के लिए आपको हम पहले एक आंकड़ा बताते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 18 फीसदी जाट वोटर हैं और करीब 27 फीसदी मुस्लिम आबादी है. यानी पश्चिम उत्तर प्रदेश में जाट और मुस्लिम मिलकर 45 फीसदी हुए.

2013 में मुजफ्फरनगर में हुए दंगों से पहले पश्चिमी यूपी की राजनीतिक तस्वीर का फैसला यही जाट और मुस्लिम वोटर मिलकर करता था. जिस पार्टी को जाट और मुस्लिम वोटर मिलकर वोट देते थे उसी पार्टी की सरकार यूपी में बनती थी. 2013 के बाद हुए तीनों चुनावों यानी 2014 के लोकसभा चुनाव, 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में जाट-मुस्लिम समीकरण बिगड़ा और जाटों ने बीजेपी के पक्ष में मतदान किया इसका नतीजा क्या रहा ये भी हम आपको बताते हैं.

चुनाव दर चुनाव किसे कितनी सीट

2012 विधानसभा चुनाव में जाट और मुस्लिम वोट साथ थे. इस चुनाव में पश्चिम उत्तर प्रदेश की 136 विधानसभा सीटों में से बीजेपी को महज 20 सीट मिली थी समाजवादी पार्टी को 58 सीट मिली थी बीएसपी को 39 सीट मिली थी, अन्य को 19 सीट मिली थी. लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों के बाद 2014 में तस्वीर बदली और लोकसभा चुनाव में पश्चिम यूपी की 27 लोकसभा सीटों में से बीजेपी ने 25 लोकसभा सीटें जीती. समाजवादी पार्टी को 2 लोकसभा सीटें मिलीं.

2017 विधानसभा चुनाव में भी जाट और मुस्लिम वोटर अलग-अलग रहा…तब पश्चिमी यूपी की विधानसभा की 136 सीटों में से बीजेपी ने 103 सीटों पर जीत दर्ज की. समाजवादी पार्टी को 27 सीटों पर जीत मिली और अन्य दलों को 6 सीटों पर जीत मिली. 2019 लोकसभा चुनाव में भी जाटों ने मजबूती से बीजेपी का साथ दिया और इलाके की 27 लोकसभा सीटों में से बीजेपी ने 20 सीटों पर जीत दर्ज की. समाजवादी पार्टी ने 4 सीटों पर जीत दर्ज की और बीएसपी ने 3 सीटों पर जीत दर्ज की.

2019 में बीजेपी की जीत इसलिए भी बड़ी है क्योंकि तब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने हाथ मिला लिया था. अब बीजेपी के सामने परेशानी क्यों है उसे भी समझिए. ऐसी राजनीतिक चर्चा है कि किसान आंदोलन के कारण पश्चिमी यूपी का जाट वोटर बीजेपी से नाराज है और दूसरी बड़ी वजह समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल का गठबंधन है. राजनीतिक पंडितों का मानना है कि समाजवादी पार्टी और लोकदल के गठबंधन से पश्चिमी यूपी में फिर एक बार जाट और मुस्लिम वोटर साथ आएंगे. और अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी की परेशानी बढ़ सकती है. इसलिए जाट नेताओं के साथ अमित शाह बैठक कर रहे हैं.

अमित शाह ने एक बार फिर क्यों संभाली कमान?

अब आपको ये भी बताते हैं कि आखिर इस सबसे महत्वपूर्ण मिशन को अमित शाह ने ही अपने हाथ में क्यों लिया है. दरअसल बीजेपी के यूपी का विधानसभा चुनाव मिशन 2024 की तैयारी है. इसलिए बीजेपी अभी से यूपी में चुनावी तैयारी में जुटी है और यूपी में चुनावी तैयारी से अमित शाह का पुराना रिश्ता है. 2012 से अमित शाह यूपी में बीजेपी की चुनावी तैयारियों का प्रबंधन करते रहे हैं और इस प्रबंधन के नतीजे भी शानदार रहे.

2014 लोकसभा चुनाव में अमित शाह यूपी में बीजेपी के चुनाव प्रभारी थे. अमित शाह के चुनाव प्रबंधन के बदौलत बीजेपी ने यूपी में 80 में से 71 सीटों पर जीत हासिल की थी. 2017 में जब यूपी में विधानसभा चुनाव हुए तो अमित शाह बीजेपी अध्यक्ष थे. तब अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी ने 312 सीटों पर जीत दर्ज की थी. 2019 लोकसभा चुनाव में भी अमित शाह बीजेपी के अध्यक्ष थे. तब यूपी में समाजवादी पार्टी और बीएसपी ने बीजेपी को रोकने के लिए गठबंधन किया. अमित शाह की रणनीति के सामने विपक्षी गठबंधन नाकाम रहा और बीजेपी ने 62 सीटों पर जीत दर्ज की. अमित शाह की चुनावी रणनीति और प्रबंधन का लोहा उनके राजनीतिक विरोधी भी मानते हैं, इसलिए अब सबसे अहम रण में अमित शाह ने खुद मोर्चा संभाला है.

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