December 2, 2020
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साहित्यिक हलचल

साहित्यिक हलचल

मोटा बांस भालू बांस

जे. पी. मैठाणी सड़क किनारे उस मोटे बांस की पत्तियों को तेज धूप में मैंने, नीली छतरी के नीचे मुस्कुराते, हिलते-डुलते, नाचते-गाते देखा। ये बांस बहुत उपयोगी है- वैज्ञानिक नाम इसका डेंड्राकैलामस जाइगेंटिस हुआ ये पोएसी परिवार से ताल्लुक रखता है। आम बोलचाल में इसे मोटा बांस कहते हैं, सिक्किम की तरफ
साहित्यिक हलचल

एक लेखक की व्यथा…

ललित फुलारा कल एक होनहार और उभरते हुए लेखक से बातचीत हो रही थी. उदय प्रकाश और प्रभात रंजन की चर्चित/नीचतापूर्ण लड़ाई पर मैंने कुछ लिखा, तो उसने संपर्क किया. शायद उसे मेरे लेखक होने का भ्रम रहा हो. उसकी बातों ने मुझे सोचने पर मजबूर किया. उसने कहा, ‘मैं लिखने के लिए ही जी […]
साहित्यिक हलचल

ईमानदार समीक्षा-साहित्य का सच्चा पाठक और लेखक

ललित फुलारा एक जानकार काफी दिनों से अपनी किताब की समीक्षा लिखवाना चाहते थे. अक्सर सोशल मीडिया लेटर बॉक्स पर उनका संदेश आ टपकता. ‘मैं उदार और भला आदमी हूं’ यह जताने के लिए उनके संदेश पर हाथ जोड़ तीन-चार दिन बाद मेरी जवाबी चिट्ठी भी पहुंच जाती. यह सिलसिला काफी लंबे वक्त का है. […]
उत्तराखंड संस्मरण साहित्यिक हलचल

उनके जाने का अर्थ एक समय का कुछ पल ठहर जाना

डॉ. हेमचन्द्र सकलानी जब भी उनको फोन करता तो बड़ी देर तक उनके आशीर्वादों की झड़ी लगी रहती थी जो मेरी अंतरात्मा तक को भिगो जाती थी। वो उत्तराखंड की वास्तव में अनोखी ज्ञानवर्धक विभूति थीं। 6 मार्च को उत्तराखंड की विभूति वीणा पाणी जोशी जी के निधन का जब सामाचार मिला तो हतप्रभ रह […]
उत्तराखंड समाज/संस्कृति संस्मरण साहित्यिक हलचल

वो बकरी वाली…

अनीता मैठाणी उसका रंग तांबे जैसा था। बाल भी लगभग तांबे जैसे रंगीन थे। पर वे बाल कम, बरगद के पेड़ से झूलती जटाएं ज्यादा लगते थे। हां, साधु बाबाओं की जटाओं की तरह आपस में लिपटे, डोरी जैसे। सिर के ऊपरी हिस्से पर एक सूती कपड़े की पगड़ी—सी हमेशा बंधी रहती थी। चेहरे से […]
आधी आबादी संस्मरण साहित्यिक हलचल

हर दिल अजीज थी वह

अनीता मैठाणी  ये उन दिनों की बात है जब हम बाॅम्बे में नेवी नगर, कोलाबा में रहते थे। तब मुम्बई को बाॅम्बे या बम्बई कहा जाता था। श्यामली के आने की आहट उसके पांव में पड़े बड़े-बड़े घुंघरूओं वाले पाजेब से पिछली बिल्डिंग से ही सुनाई दे जाती थी। उसका आना आमने-सामने की बिल्डिंग में […]
शिक्षा साहित्यिक हलचल

भाषा की सामाजिक निर्मिति

प्रकाश चंद्र भाषा सिर्फ वही नहीं है जो लिखी व बोली जाती है बल्कि वह भी है जो आपकी सोच, व्यवहार, रुचि और मानसिकता को बनाती है। आज लिखित भाषा से ज्यादा इस मानसिक भाषा का विश्लेषण किया जाना जरूरी है। भाषा का दायरा बहुत बड़ा है इसे सिर्फ एक शब्द या फिर सैद्धांतिक व […]
साहित्यिक हलचल

आदमी को भूख जिंदा रखती है

–  नीलम पांडेय “नील” ना जाने क्यों लगता है कि इस दुनिया के तमाम भूखे लोग लिखते हैं,  कविताएं या कविताओं की ही भाषा बोलते हैं। जो जितना भूखा, उसकी भूख में उतनी ही जिज्ञासाएं और उतने ही प्रश्न छिपे होते हैं। अक्सर कविताएं भी छुपी होती हैं। ताज्जुब यह भी है कि उस भूखे […]