October 20, 2020
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समाज/संस्कृति

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पर्वतीय जीवन शैली के अभिन्न अंग हैं उरख्यालि और गंज्यालि

विजय कुमार डोभाल हमारे पहाड़ी दैनिक-जीवन में भरण-पोषण की पूर्त्ति के लिये हथचक्की (जंदिरि) और ओखली मूस (उरख्यलि-गंज्यालि) से कूटने-पीसने की प्रक्रिया सनातनकाल से चली आ रही है. because यह भी कहा जा सकता है कि ये हमारे पर्वतीय जीवन शैली के अभिन्न अंग हैं, जिनके बिना जीवन कठिन है.ओखल-मूसल और
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अपने बच्‍चों को पढ़ाएं नैतिक शिक्षा का पाठ

कैसे बनता है कोई समाज, कौन हैं ये लोग? डॉ. दीपा चौहान राणा बिना किसी व्यक्ति विशेष के किसी समाज का निर्माण नहीं हो सकता है. हम मानव ही सभी समाज की नींव हैं. लेकिन इसी समाज में हमें सामाजिक बुराई देखने को मिलती है, एक से एक घिनौनी कुरीतियां तब से becauseचली आ रही […]
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बड़ी खूबसूरती से निरूपित किया है जैव विविधता के सन्तुलन को सनातनी परम्परा में

भुवन चन्द्र पन्त प्रारम्भिक स्तर की कक्षाओं के पाठ्यक्रम में बेसिक हिन्दी रीडर में एक पाठ हुआ करता था, जिसका शीर्षक अक्षरक्षः तो स्मरण नहीं हो पा रहा है, कुछ यों था कि वनस्पति एवं जीव-जन्तु परस्पर एक दूसरे पर निर्भर हैं. तब जैव विविधता जैसे शब्द नहीं खोजे गये थे, लेकिन जिस खूबसूरती से […]
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हर दुल्हन के श्रृंगार में चार चांद लगाती पारपंरिक नथ

दुनियाभर में मशहूर है टिहरी की सोने से बनी नथ आशिता डोभाल संस्कृति सिर्फ खान-पान because और रहन-सहन में ही नहीं होती, बल्कि हमारे आभूषणों में भी रची-बसी  होती है. उत्तराखंड तो संस्कृति सम्पन्न प्रदेश है और हमारी सम्पन्नता हमारे परिधानों और गहनों में सदियों पुरानी है. उत्तराखंड देश दुनिया में अपने परम्पराओं के लिए […]
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‘दो व्यक्तियों के बीच का गीतात्मक वाक्य व्यवहार है बाजूबन्द गीत’

ध्यान सिंह रावत ‘ध्यानी’ समाज में गायन की अनको विधाओं का because चित्रण देखने व सुनने को मिल जाता है. छौपती, छूड़े, पवाड़े, बाजूबन्द, लामण, तांदी गीत, आदि  मनोरंजन तो हैं ही साथ ही जीवन यथार्थ से जुड़ी सुख -दुःख,  प्रेम प्रसंगों व अनको घटनाओं पर भी आधारित हैं. इन्हीं विधाओं में गायन की एक […]
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विलुप्ति के कगार पर पारंपरिक व्‍यंजन अरसे की मिठास

आशिता डोभाल अरसे/अरसा पहाड़ में समूण या कलेउ becauseके रूप मे दिया जाने वाला एक पकवान है, जो उत्तराखण्ड में सिर्फ गढ़वाल मण्डल में प्रमुखता से बनता है बल्कि हमसे लगे कुमाऊं, जौनसार—बावर, बंगाण, हिमाचल प्रदेश, नेपाल, तिब्बत कहीं भी अरसा नही बनता है. इसके इतिहास की बात करें तो बहुत ही रूचिपूर्ण इतिहास रहा […]
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ब्राह्मण ग्रन्थों में ब्रह्मांड चेतना से अनुप्रेरित पितर अवधारणा 

एक दार्शनिक चिंतन डॉ.  मोहन चंद तिवारी  ‘ऐतरेय ब्राह्मण’ में सोमयाग सम्बन्धी एक सन्दर्भ वैदिक कालीन पितरों की ब्रह्मांड से सम्बंधित आध्यात्मिक अवधारणा को समझने की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है ब्राह्मण “अन्यतरोऽनड्वान्युक्तः स्यादन्यतरो विमुक्तोऽथ राजानमुपावहरेयुः. यदुभयोर्विमुक्तयोरुपावहरेयुः पितृदेवत्यंbecause राजानं कुर्युः. यद्युक्तयोरयोगक्षेमःbut
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वैदिक पितृपूजा का ऐतिहासिक और धार्मिक विकास क्रम

धार्मिक मान्यता के अनुसार सत्य और श्रद्धा से किया गया कर्म ‘श्राद्ध’ कहलाता डा. मोहन चंद तिवारी  सामान्य तौर पर पितृपक्ष में किया जाने वाला श्राद्ध-तर्पण आदि कृत्य पूर्वजों, माता-पिता और आचार्य के प्रति सम्मान का भाव है. धार्मिक मान्यता के अनुसार सत्य और श्रद्धा से किया गया कर्म ‘श्राद्ध’ कहलाता है और जिस कर्म […]
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वैदिक साहित्य में पितर अवधारणा और उसका उत्तरवर्त्ती विकास

डॉ. मोहन चंद तिवारी पितृपक्ष चर्चा पितृपक्ष के इस कालखंड में पितर जनों के स्वरूप और उसके ऐतिहासिक विकासक्रम की जानकारी भी बहुत जरूरी है. इस लेख में वैदिक काल से लेकर धर्मशात्रों और निबन्धग्रन्थों (मध्यकाल) तक की पितर परम्परा का विहंगमावलोकन किया गया है. भारतीय चिंतन परम्परा में वैदिक काल से ही समूचे ब्रह्मांड […]
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पुत्र अपने कुल को ही तारता है, पुत्रियां दो-दो कुलों को तारतीं हैं

डॉ. मोहन चंद तिवारी   पितृपक्ष के अवसर पर प्राय: यह जिज्ञासा प्रकट की जाती है कि श्राद्ध का अधिकार किस किस को है? क्या पुत्र के अतिरिक्त पुत्री या पत्नी को भी श्राद्ध करने का अधिकार है या नहीं? कुछ पितृसत्तात्मक परंपरागत समाजों में स्थानीय मान्यताओं के कारण केवल पुत्र को या पुरुष को ही […]