October 20, 2020
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बाघ जब एकदम सामने आ गया

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—27 प्रकाश उप्रेती आज किस्सा ‘बाघ’ का. बाघ का हमारे गाँव से गहरा नाता रहा है. गाँव में हर किसी के पास बाघ के अपने-अपने अनुभव और क़िस्से हैं. हर किसी का बाघ से एक-दो बार तो आमना -सामना हुआ ही होगा. अपने पास भी बाघ को लेकर कुछ […]
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आम के इतने नाम कि…

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—26 प्रकाश उप्रेती आज बात- ‘आम’ और ‘नाम’ की. हमारे गाँव में आम ठीक-ठाक मात्रा में होता है. गाँव का एक सामूहिक बगीचा है जिसमें सभी गाँव वालों के पेड़ हैं. उसमें बहुत से पेड़ तो गांवों के ‘बुबुओं’ (दादा जी लोगों के नाम के) के नाम के भी […]
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पिता तो पिता है, हमसे कब वो जुदा है

पितृ दिवस पर विशेष डॉ. अरुण कुकसाल मानवीय रिश्तों में सबसे जटिल रिश्ता पिता के साथ माना गया है. भारतीय परिवेश में पारिवारिक रिश्तों की मिठास में ‘पिता’ की तुलना में ‘मां’ फायदे में रहती है. परिवार में ‘पिता’ अक्सर अकेला खड़ा नज़र आता है. तेजी से बदलती जीवनशैली में परिवारों के भीतर पिता का […]
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च्यलेल परदेश और चेलिलि सौरास जाणे होय

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—25 प्रकाश उप्रेती आज- ईजा, मैं और परदेश. ईजा की हमेशा से इच्छा रही कि हम भी औरों के बच्चों की तरह पढ़-लिखकर भविष्य बनाएँ. तब हमारे गाँव के बच्चों का भविष्य शहरों में जाकर ही बनता था. ईजा के लिए मुझे शहर भेजना मजबूरी और जरूरी दोनों था. […]
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सौण कम न भादौ

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—24 प्रकाश उप्रेती आज बात- बरसात, रात, सूखा, ‘गोल्देराणी’ पूजना और पहाड़ की. पहाड़ में बरसात के दिन किसी आफ़त से और रातें आपदा से कम नहीं होती थीं. चौमास में ‘झड़’ (कई दिनों तक लगातार बारिश का होना) पड़ जाते थे तो वहीं बे-मौसम बारिश सबकुछ बहा ले […]
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जबही महाराजा देस में आए …

‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—12 रेखा उप्रेती “बारात आ गयी !!” यह वाक्य हमारे भीतर वैसा ही उत्साह जगाता जैसे ओलंपिक्स में स्वर्ण-पदक जीतने की सूचना … उत्साह का बीज तो किसी बुआ या दीदी का ‘ब्याह ठहरते’ ही अँखुआ जाता. घर की लिपाई-पुताई, ऐपण, रंग्वाली पिछौड़, सुआल-पथाई, धुलिअर्घ की चौकी जैसे कई काज घर […]
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घास और थुपुड का पहाड़

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—23 प्रकाश उप्रेती हम इसे- ‘घा थुपुड’ कहते हैं. यह एक तरह से सूखी घास को लंबे समय तक धूप-बरसात से बचाकर सुरक्षित रखने का तरीका है. जब जंगलों में आग लग जाती थी और घास नहीं मिलती थी तो इसी घास से काम चलता था. पहाड़ अपनी परिस्थितियों […]
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‘गीला या सूखा’ का खेल

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—22 प्रकाश उप्रेती आज बात उस खेल की जिसकी लत बचपन में लगी और मोह अब तक है. हम इसे- “बैट- बॉल” खेलना कहते थे और दूसरे गाँव में ‘क्रिकेट’ नहीं ‘मैच खेलने’ जाते थे. पांव से लेकर सर तक जितने ‘घो’ (घाव) हैं उनमें से कइयों की वजह […]
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खाँकर खाने चलें…!!

‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—11 रेखा उप्रेती शुरू जाड़ों के दिन थे वे. बर्फ अभी दूर-दूर पहाड़ियों में भी गिरी नहीं थी, पर हवा में बहती सिहरन हमें छू कर बता गयी थी कि खाँकर जम गया होगा… इस्कूल की आधी छुट्टी में पाँचवीं कक्षा में पढ़ने वाले सीनियर्स ने प्रस्ताव रखा “हिटो, खाँकर खाने […]
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एक क्रांति का नाम – नईमा खान उप्रेती

पुण्यतिथि पर विशेष मीना पाण्डेय नईमा खान उप्रेती एक क्रांति का नाम था. एक तरफ उत्तराखंड के लोक गीतों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर लाने के लिए उन्होंने मोहन उप्रेती जी के साथ मिलकर एक बड़ी भूमिका निभाई. दूसरी ओर रंगमंच और लोक कलाओं में महिला भागीदारी के प्रति तत्कालीन समाज की जड़ मान्यताओं […]