February 27, 2021
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शहर में मिले गांधी जी और देश में मिले प्रेमचंद!

बुदापैश्त डायरी-10 डॉ. विजया सती बुदापैश्त में गांधी  गांधी जहां कहीं भी हों, उस जगह जाना, उनके साथ पल भर को ही सही, बस होना मुझे प्रिय है. और गांधी विश्व में कहां नहीं? तो बुदापैश्त में भी मिले. .. गैलर्ट हिल पर ! इस नन्हीं खूबसूरत पहाड़ी पर है- गार्डन ऑफ़ फिलॉसफी या फिलॉसफर्स […]
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गुड़ की भेलि में लिपटे अखबार का एक दिन

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—44 प्रकाश उप्रेती आज किस्सा- “ईजा और अखबार” का.  ईजा अपने जमाने की पाँच क्लास पढ़ी हुई हैं. वह भी बिना एक वर्ष नागा किए. जब भी पढ़ाई-लिखाई की बात आती है तो ईजा ‘अपने जमाने’ वाली बात को दोहरा ही देती हैं. हम भी कई बार गुणा-भाग और […]
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‘वड’ झगडै जड़

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—43 प्रकाश उप्रेती आज बात “वड” की. एक सामान्य सा पत्थर जब दो खेतों की सीमा निर्धारित करता है तो विशिष्ट हो जाता है. ‘सीमा’ का पत्थर हर भूगोल में खास होता है. ईजा तो पहले से कहती थीं कि- “वड झगडै जड़” (वड झगड़े का कारण). ‘वड’ उस […]
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प्राकृतिक आपदाओं से कराहते लोग…

बंगाण क्षेत्र की आपदा का एक वर्ष… लोगों का दर्द और मेरे पैरों के छाले… आशिता डोभाल बंगाण क्षेत्र का नाम सुनते ही मानो दिल और दिमाग पल भर के लिए थम से जाते हैं  क्योंकि बचपन से लेकर आजतक न जाने कितनी कहानियां, दंत कथाएं वहां के सांस्कृतिक और धार्मिक परिवेश पर सुनी हैं, […]
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बुदापैश्त में गुरुदेव स्मृति

बुदापैश्त डायरी-9 डॉ. विजया सती गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को मई माह के आरम्भ से अगस्त तक कई रूपों में याद किया गया. बुदापैश्त से मेरे मन की भी यह एक मधुर स्मृति ! बुदापैश्त में मार्च महीने के अंतिम सप्ताह में सामान्यत: ऐसा मौसम नहीं होता था. किन्तु उस दिन अप्रत्याशित रूप से सुखद हल्की […]
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करछी में अंगार

‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—16 रेखा उप्रेती कुछ अजीब-सा शीर्षक है न… नहीं, यह कोई मुहावरा नहीं, एक दृश्य है जो कभी-कभी स्मृतियों की संदूकची से बाहर झाँकता है… पीतल की करछी में कोयले का अंगार ले जाती रघु की ईजा… जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाती… अपने घर की ओर जाती ढलान पर उतर रही है, बहुत […]
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पहाड़ों में ‘छन’ की अपनी दुनिया

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—42 प्रकाश उप्रेती आज बात “छन” की. छन मतलब गाय-भैंस का घर. छन के बिना घर नहीं और घर के बिना छन नहीं.  पहाड़ में घर बनाने के साथ ही छन बनाने की भी हसरत होती थी. एक अदत छन की इच्छा हर कोई पाले रहता है. ईजा को […]
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‘हे दरी हिमाला दरी ताछुम’

डॉ. अमिता प्रकाश “हे दरी हिमाला दरी ताछुम-ताछुमा-छुम. दरी का ऐंगी सौदेर दरी ताछुम-ताछुमा-छुम”.. हाथों से एक दूसरे की बाँह पकड़कर घेरे में गोल-गोल घूमकर दो कदम आगे बढ़ाते हुए धम्म से कूदती हुई लड़कियों को देखकर छज्जे में बैठी मेरी नानी, मामी और दूसरी लड़कियों की दादी, बोडी (ताई), काकी (चाची) की टिप्पणियाँ हमें […]
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कंकट सिर्फ लकड़ी नहीं बल्कि पहाड़ की विरासत का औज़ार है

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—41 प्रकाश उप्रेती पहाड़ जरूरत और पूर्ति के मामले में हमेशा से उदार रहे हैं. वहाँ हर चीज की निर्मिति उसकी जरूरत के हिसाब से हो जाती है. आज जरूरत के हिसाब से इसी निर्मिति पर बात करते हैं. यह -“कंकट” है. इसका शाब्दिक अर्थ हुआ काँटा, काटने वाला. […]
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अब कौन ‘नटार’ से डरता है…

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—40 प्रकाश उप्रेती पहाड़ में खेती हो न हो लेकिन “नटार” हर खेत में होता था. “नटार” मतलब खेत से चिड़ियों को भगाने के लिए बनाया जाने वाला ढाँचा सा. तब खेतों में जानवरों से ज्यादा चिड़ियाँ आती थीं. एक -दो नहीं बल्कि पूरा दल ही आता था. झुंगर, […]