March 8, 2021
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संस्मरण

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ग़म-ए-ज़िदगी तेरी राह में

बुदापैश्त डायरी-14 डॉ. विजया सती ग़म-ए-ज़िदगी तेरी राह में, शब-ए-आरज़ू तेरी चाह में ………………………..जो बिछड़ गया वो मिला नहीं ! बुदापैश्त शान्दोर कोरोशी चोमा के लिए हम यही कह सकते हैं! so बुदापैश्त जाकर इन्हें जानना संभव हुआ क्योंकि हंगेरियन
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बिना पड़ाव (बिसोंण) के नहीं चढ़ा जाए पहाड़

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—55 प्रकाश उप्रेती पहाड़ में पड़ाव का बड़ा महत्व है. इस बात को हमसे ज्यादा वो समझते थे जिनकी समझ को हम नासमझ मानते हैं. हर रास्ते पर बैठने के लिए कुछ पड़ाव होते थे ताकि पथिक वहाँ  बैठकर सुस्ता सके. दुकान से आने वाले रास्ते से लेकर पानी, […]
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सॉल’ या ‘साही’ (Porcupine) की आवाज के दिन

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—54 प्रकाश उप्रेती सर्दियों के दिन थे.because हम सभी गोठ में चूल्हे के पास बैठे हुए थे. ईजा रोटी बना रही थीं. हम आग ‘ताप’ रहे थे. हाथ से ज्यादा ठंड मुझे पाँव में लगती थी. मैं थोड़ी-थोड़ी देर में चूल्हे में जल रही आग की तरफ दोनों पैरों […]
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मेरे बगीचे के फूल

सुनीता भट्ट पैन्यूली मानसून के पदचापों की आमद हर because तरफ़ सुनाई दे रही है. पेड़ों के अपनी जड़ों से विलगित होने का शोर शायद ही मानवता को सुनाई दे किंतु इस वर्षाकाल में कोरोना का हाहाकार और मानवता के उखड़ने और उजड़कर गिरने का शोर हर रोज़ कर्णों को भेद रहा है. मानसून इस […]
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गाँव का इकलौता ‘नौह’ वो भी सूख गया

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—53 प्रकाश उप्रेती पहाड़ में पानी और ‘नौह’ की because बात मैंने पहले भी की है लेकिन आज उस नोह की बात जिसे मैंने डब-ड़बा कर छलकते हुए  देखा है. उसके बाद गिलास से पानी भरते हुए और कई सालों से बूँद-बूँद के लिए तरसते हुए भी देखा है. […]
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समृतियों की मंजूषा से…

सुनीता भट्ट पैन्यूली काले घनीभूत बादल उभर आये थे soआसमान में, सुकून भरी अपने हिस्से की बारिश में भीगने का स्वप्न संजोने लगीं थी कुछ बेदार आंखें…, इन्हीं स्वप्नों को हकीकत में बदलने का ख़्याल सबसे जुदा कुनबों से उन बेख़ौफ़ चुनिंदा दिलों में कुंडली मारकर बैठ गया…घने हो आये तिरते बादलों के रलने-मिलने में. […]
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वो “सल्डी सुंगनाथ” और देवीदत्त मासीवाल का फ़ोटो स्टूडियो

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—52 प्रकाश उप्रेती तब कैमरे का फ्लैश चमकना भी चमत्कार लगता था. कैमरा देख लेना ही चाक्षुष तृप्ति का चरम था. देखने के लिए हम सभी बच्चों की भीड़ इकट्ठा हो जाया करती थी और कैमरे को लेकर हम becauseअपना गूढ़ ज्ञान आपस में साझा करते थे. हम सबकी […]
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ऑक्सफोर्ड, हिन्दी और इमरै बंघा

बुदापैश्त डायरी-13 डॉ. विजया सती बुदापैश्त में हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थियों का because अध्ययन ब्रजभाषा काव्य पढ़े बिना पूरा नहीं होता और इस भाषा के विशेषज्ञ के रूप में वहां निमंत्रित होते हैं डॉ इमरै बंघा. बुदापैश्त डॉ बंघा बुदापैश्त में इंडोलोजी के छात्र रहे but और विश्वभारती, शान्तिनिकेतन में शोधार्थी. वर्तमान में वे ऑक्सफोर्ड […]
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जागरी, बुबू और मैं (धामी लगा म्येरी चाल) अंतिम भाग

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—51 प्रकाश उप्रेती नरसिंह देवता थोड़ा हिले लेकिन नाचे नहीं. बुबू कुछ समझ रहे थे क्योंकि वो उनके पुराने जगरी थे. उनके घर में पहली बार ‘नौतार’ (पहली-पहली बार) भी बुबू ने अवतरित किया था. becauseउस समय becauseनरसिंह ने गुरु के तौर पर ‘हाथ मार’ (वचन दिया) रखा था […]
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जागरी, बूबू और मैं (घात-मघता, बोली-टोली) भाग-2

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—50 प्रकाश उप्रेती हुडुक बुबू ने नीचे ही टांग रखा था लेकिन किसी ने उसे उठा कर ऊपर रख दिया था. बुबू ने हुडुक झोले से निकाला और हल्के से उसमें हाथ फेरा, वह ठीक था. उसके बाद वापस झोले में रख दिया. so हुडुक रखने के लिए एक […]