April 13, 2021
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कुछ लोग दुनिया में खुशबू की तरह हैं

देश—परदेश भाग—4 डॉ. विजया सती बुदापैश्त में हिन्दी की तमाम गतिविधियों की बागडोर मारिया जी लम्बे समय से संभाले हुए हैं. डॉ मारिया नैज्येशी! बुदापैश्त में प्रतिष्ठित ऐलते विश्वविद्यालय के भारोपीय अध्ययन विभाग की अनवरत अध्यक्षा! मारिया जी विश्वविद्यालय स्तर पर प्राचीन यूनानी, लैटिन और संस्कृत
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हमारे हिस्से के प्रो. डीडी पंत

सुप्रसिद्ध भौतिकशास्त्री और हिमालय के चिंतक प्रो. डीडी पंत की पुण्यतिथि (11 जून, 2008) पर विशेष चारु तिवारी मैं तब बहुत छोटा था. नौंवी कक्षा में पढ़ता था. यह 1979-80 की बात है. बाबू (पिताजी) ने बताया कि दुनिया के एक बहुत बड़े वैज्ञानिक आज बग्वालीपोखर में आ रहे हैं. बग्वालीपोखर में उन दिनों सड़क […]
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चीड़ को इस नज़र से भी देखना होगा

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—20 प्रकाश उप्रेती पहाड़ की हर चीज आपको कुछ न कुछ देती है. पहाड़ के लोगों का हर पेड़, ढुङ्ग (पत्थर), भ्योव (पहाड़), गढ्यर, और झाड़ियों से एक रिश्ता होता है. आज बात करते हैं- ‘सोह डाव’ (चीड़ के पेड़) और उसकी धरोहर- ‘ठिट'(चीड़ का फल) और ‘छिलुक’ (आग […]
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अपनेपन की मिठास कंडारी बंधुओं का ‘कंडारी टी स्टाल’

डॉ. अरुण कुकसाल चर्चित पत्रकार रवीश कुमार ने अपनी किताब ‘इ़श्क में शह़र होना’ में दिल से सटीक बात कही कि ‘’मानुषों को इश्क आपस में ही नहीं वरन किसी जगह से भी हो जाता है. और उस जगह के किन्हीं विशेष कोनों से तो बे-इंतहा इश्क होता है. क्योंकि बीते इश्क की कही-अनकही बातें […]
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पप्पू कार्की: सुरीली आवाज का जादूगर

चारु तिवारी हम लोग उन दिनों राजधानी गैरसैंण आंदोलन के लिये जन संपर्क करने पहाड़ के हर हिस्से में जा रहे थे. हमारी एक महत्वपूर्ण बैठक हल्द्वानी में थी. बहुत सारे साथी जुटे. कुमाऊं क्षेत्र के तो थे ही गढ़वाल के दूरस्थ क्षेत्रों से भी कई साथी आये थे. हमारे हल्द्वानी के साथी सीए सरोज […]
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पेट पालते पेड़ और पहाड़ 

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—19 प्रकाश उप्रेती आज बात उस पहाड़ की जो आपको भूखे नहीं रहने देता था. तस्वीर में आपको- तिमिल और कोराय के पेड़ नज़र आ रहे हैं. तिमिल की हमारे यहां बड़ी मान्यता थी. गाँव में तिमिल के तकरीबन 10-12 पेड़ थे. कहने को वो गाँव के अलग-अलग लोगों […]
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कालेकावा और उतरैंणि कौतिक

‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—10 रेखा उप्रेती माघ की पहली भोर, पहाड़ों पर कड़कड़ाता जाड़े का कहर, सूरज भी रजाई छोड़ बाहर आने से कतरा रहा है, पर छोटे-छोटे बच्चे माँ की पहली पुकार पर उठ गए हैं. आज न जाड़े की परवाह है न अलसाने का लालच. झट से सबने अपनी ‘घुगुती माला’ गले […]
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जागर, आस्था और सांस्कृतिक पहचान की परंपरा

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—18 प्रकाश उप्रेती आज बात बुबू (दादा) और हुडुक की. पहाड़ की आस्था जड़- चेतन दोनों में होती है . बुबू भी दोनों में विश्वास करते थे. बुबू ‘जागेरी’ (जागरी), ‘मड़-मसाण’, ‘छाव’ पूजते थे और किसान आदमी थे. उनके रहते घर में एक जोड़ी भाबेरी बल्द होते ही थे. […]
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कब चुभेंगे हिसाऊ, क़िलमोड के कांटे

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—17 प्रकाश उप्रेती आज बात हिसाऊ, क़िलमोड और करूँझ की. ये हैं, कांटेदार झाड़ियों में उगने वाले पहाड़ी फल. इनके बिना बचपन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. देश के अन्य राज्यों में ये होते भी हैं या नहीं इसकी जानकारी मुझे नहीं है. बचपन में कभी […]
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पहाड़ों में गुठ्यार वीरान पड़े…

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—16 प्रकाश उप्रेती ये है हमारा- छन और गुठ्यार. इस गुठ्यार में दिखाई देने वाली छोटी, ‘रूपा’ और बड़ी, ‘शशि’ है. गाय-भैंस का घर छन और उनका आँगन गुठ्यार कहलाता है. गाय- भैंस को जिनपर बांधा जाता है वो ‘किल’. किल जमीन के अंदर घेंटा जाता है. हमारी एक […]