September 20, 2020
Home Archive by category संस्मरण (Page 11)

संस्मरण

संस्मरण

किस्सा टूटी तख्ती का

‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—3 रेखा उप्रेती टूटे हुए मूँठ वाली भारी-भरकम उस तख्ती का पूरा इतिहास तो ज्ञात नहीं, पर इतना ज़रूर जानती हूँ कि पाँच भाई-बहनों को अक्षर-ज्ञान करा, जब वह मुझ तक पहुँची, तो घिस-घिसकर उसके चारों किनारे गोल हो चुके थे. पकड़ने वाली मूँठ न रहने के कारण उसके दोनों तरफ […]
संस्मरण

काकड़, कोरैण, रायत और पीसी लूण

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—5 प्रकाश उप्रेती आज बात- ‘कोरैण’ की. कोरैण माने कोरने वाला. लुप्त होने के लिए ‘ढिका’ (किनारे) में बैठा यह औजार कभी भी लुढ़क सकता है. फिर हम शायद ही इसे देख पाएं. उन दिनों पहाड़ में हर घर की जरूरत थी -कोरैण. अब तो इसके कई स्थानापन आ […]
संस्मरण

एक घुमक्कड़ की गौरव गाथा-दुनिया ने माना, हमने भुलाया

पंडित नैन सिंह रावत (21 अक्टूबर, 1830-1 फरवरी, 1895) डॉ. अरुण कुकसाल 19वीं सदी का महान घुमक्कड़-अन्वेषक-सर्वेक्षक पण्डित नैन सिंह रावत (सन् 1830-1895) आज भी ‘‘सैकड़ों पहाड़ी, पठारी तथा रेगिस्तानी स्थानों, दर्रों, झीलों, नदियों, मठों के आसपास खड़ा मिलता है. लन्दन की रॉयल ज्‍यॉग्रेफिकल सोसायटी, स्‍टॉटहोम के स्वेन हैडिन फाउण्डेशन, लन्दन की इण्डिया आफिस लाइब्रेरी, […]
संस्मरण

हिमालय के साथ चलने वाला व्यक्तित्व

राजेन्द्र धस्माना की पुण्यतिथि (16 मई) पर विशेष चारु तिवारी उम्र का बड़ा फासला होने के बावजूद वे हमेशा अपने साथी जैसे लगते थे. उन्होंने कभी इस फासले का अहसास ही नहीं होने दिया. पहाड़ के कई कोनों में हम साथ रहे. एक बार हम उत्तरकाशी साथ गये. रवांई घाटी में. भाई शशि मोहन रावत […]
संस्मरण

इस्कूल से ई-स्कूल तक : ये कहाँ आ गए हम…

‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़ भाग—2 रेखा उप्रेती स्कूल बंद हैं. नहीं, बंद नहीं हैं… आजकल मोबाइल के रास्ते घर के कोने तक पहुँच गए हैं. मेरा बच्चा बिना नहाए-धोए, बिना यूनिफार्म पहने उस कोने में बैठा अध्यापिका से पाठ सुन रहा है. अध्यापिका का चेहरा भर दीखता है स्क्रीन पर… . सहपाठी गायब हैं और […]
संस्मरण

‘तीलू पिन’ मतलब जाड़ों की ख़ुराक़

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—4 प्रकाश उप्रेती आज बात-‘तीलू पिन’ (तिल के लड्डू) की.हमारे यहाँ यह सर्दियों की ख़ुराक थी. पहाड़ के जिन इलाकों में तिल ज्यादा होते हैं, वहाँ ‘पिन’ बनता ही था. हमारे यहाँ तिल ठीक-ठीक मात्रा में होते थे. बाकायदा कुछ खेत तिल के लिए ही जाने जाते हैं. उनको तिल […]
संस्मरण

अब कहाँ होगी भेंट…

हम याद करते हैं पहाड़ को… या हमारे भीतर बसा पहाड़ हमें पुकारता है बार-बार? नराई दोनों को लगती है न! तो मुझे भी जब तब ‘समझता’ है पहाड़ … बाटुइ लगाता है…. और फिर अनेक असम्बद्ध से दृश्य-बिम्ब उभरने लगते हैं आँखों में… उन्हीं बिम्बों में बचपन को खोजती मैं फिर-फिर पहुँच जाती हूँ […]
संस्मरण

कब लौटेगा पाई में लूण…

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—3 प्रकाश उप्रेती आज बात- ‘पाई’ की. पहाड़ के हर घर की शान ‘पाई’ होती थी. पाई के बिना खाना बनने वाले गोठ की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. पाई दरअसल लकड़ी की बनी वह चीज थी जिसमें पिसा हुआ लूण और चटनी रखते थे. मोटी लकड़ी […]
संस्मरण

जाड़ों की बरसात में जब पड़ते ‘घनगुड़’ थे

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—2 प्रकाश उप्रेती आज बात– ‘घनगुड़’ की. पहाड़ों पर जाड़ों में जब बरसात का ज़ोर का गड़म- गड़ाका होता था तो ईजा कहती थीं “अब घनगुड़ पडील रे”. मौसम के हिसाब से पहाड़ के जंगल आपको कुछ न कुछ देते रहते हैं. बारिश तो शहरों में भी होती है […]
संस्मरण

जंगल जाते, किम्मु छक कर खाते

प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है। शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें […]