August 7, 2020
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अब कौन ‘नटार’ से डरता है…

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—40 प्रकाश उप्रेती पहाड़ में खेती हो न हो लेकिन “नटार” हर खेत में होता था. “नटार” मतलब खेत से चिड़ियों को भगाने के लिए बनाया जाने वाला ढाँचा सा. तब खेतों में जानवरों से ज्यादा चिड़ियाँ आती थीं. एक -दो नहीं बल्कि पूरा दल ही आता था. झुंगर,
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दुना नदी के तट से

बुदापैश्त डायरी-8 डॉ. विजया सती जब हम बुदापैश्त में थे, ऐसे अवसर भी आए जब देश और विदेश एक हो गए! … वह तीस जनवरी की सुबह थी,  दुना नदी के किनारे की ठंडक ने देह में सिहरन पैदा की. तट से ज़रा ही दूर, वाहनों की आवाजाही के बीच सड़क का एक कोना धीरे-धीरे […]
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ओ हरिये ईजा..कुड़ी मथपन आग ए गो रे

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—38 प्रकाश उप्रेती ‘ओ…हरिये ईजा ..ओ.. हरिये ईज… त्यूमर कुड़ी मथपन आग ए गो रे’ (हरीश की माँ… तुम्हारे घर के ऊपर तक आग पहुँच गई है). आज बात उसी- “जंगलों में लगने वाली आग” की. मई-जून का महीना था. पत्ते सूख के झड़ चुके थे. पेड़ कहीं से […]
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“खाव” जब आबाद थे

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—37 प्रकाश उप्रेती पहाड़ में पानी समस्या भी है और समाधान भी. एक समय में हमारे यहाँ पानी ही पानी था. इतना पानी कि सरकार ने जगह-जगह सीमेंट की बड़ी-बड़ी टंकियाँ बना डाली थी. जब हमारी पीढ़ी सीमेंट की टंकियाँ देख रही थी तो ठीक उससे पहले वाली पीढ़ी […]
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जीवन का अँधेरा दूर करने वाला ‘लम्फू’

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—36 प्रकाश उप्रेती आज बात रोशनी के उस सीमित घेरे की जहां से अंधेरा छटा. जीवन की पहली किताब उस रोशनी के नाम थी जिसे हम ‘लम्फू’ कहते थे. ‘लम्फू’ मतलब लैम्प. वह आज के जैसा लैम्प नहीं था. उसकी रोशनी की अदायगी निराली थी. पढ़ाई से लेकर लड़ाई तक […]
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हौंसलों की उड़ान

भारतमाता की सेवा में समर्पित यमुना घाटी के कई लाल ध्‍यान सिंह रावत ‘ध्‍यानी’ सीमान्त जनपद उत्तरकाशी का रवांई क्षेत्र जहां अपनी सांस्कृतिक विविधता प्राकृतिक सुन्दरता के लिए जग जाहिर है वहीं शिक्षा के क्षेत्र में भी इन सुदूरवर्ती गांवों से निकलने वाले नौजवान ने विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा कर समूचे देश  के साथ कंधे […]
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गोधनी ईजा छाँ कसि फाने: घूर..घवां..

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—35 प्रकाश उप्रेती यह हमारे जीवन का वो किस्सा है, जो हर तीसरे और चौथे दिन घटता ही था. इसकी स्मृतियाँ कभी धुँधली नहीं होती बल्कि चित्र बन आँखों में तैरने लगती हैं. वो स्मृतियाँ हैं -‘ईजा’ (माँ) के ‘छाँ  फ़ानने’ की. मतलब कि छाँछ बनाने की. ईजा ने […]
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काणी मैं (मामी) उर्फ हल्या बौ (भाभी)

डॉ. अमिता प्रकाश पहाड़ हम पहाड़वासियों की रग-रग में इसी तरह बसा है जैसे शरीर में प्राण. प्राण के बिना जैसे शरीर निर्जीव है, कुछ वैसे ही हम भी प्राणहीन हो जाते हैं, पहाड़ के बिना. पहाड़ में हमारी जड़ें हैं जिनसे आज भी हम पोषण प्राप्त कर रहे हैं और जीवन के संघर्ष में […]
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बाबिल की घास सिर्फ घास नहीं है

प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है। शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें ठेठ […]
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यादों में एक शहर

डॉ विजया सती दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज से हाल में ही सेवानिवृत्त हुई हैं. इससे पहले आप विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हिन्दी–ऐलते विश्वविद्यालय, बुदापैश्त, हंगरी में तथा प्रोफ़ेसर हिन्दी – हान्कुक यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरन स्टडीज़, सिओल, दक्षिण कोरिया में कार्यरत रहीं. साथ ही महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, पुस्तक समीक्षा, संस्मरण, आलेख निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं. विजया