October 30, 2020
Home Archive by category संस्मरण

संस्मरण

संस्मरण

दशहरे का त्‍योहार यादों के झरोखे से…

अनीता मैठाणी नब्बे के दशक की एक सुबह… शहर देहरादून… हमारी गली और ऐसे ही कई गली मौहल्लों में… साइकिल की खड़खड़ाहट और … एक सांस में दही, दही, दही, दही दही, दही की आवाज़. दशक कुछ ही देर में दूसरी साइकिल की खड़खड़ but और आवाज वही दही की, पर इस बार दोई… दोई…, […]
संस्मरण

वो पीड़ा… यादें बचपन की

एम. जोशी हिमानी छुआछूत किसी भी समाज की मानसिक बर्बरता का द्योतक है. हमारे समाज में छुआछूत का कलंक सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा है. आज के तथाकथित सभ्य समाज में भी यह बहुत गहरे so तक मौजूद है. उसके खात्मे की बातें मात्र किताबी हैं, समय पड़ने पर छुआछूत का नाग अपने फन […]
संस्मरण

हर रोग का इलाज था ‘ताव’

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—58 प्रकाश उप्रेती पहाड़ पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्वयं के ढलने की कहानी भी है. पहाड़ विलोम में जीता और अपनी संरचना में ढलते हुए भी निशान छोड़ जाता है. आज उन निशान में से एक “ताव” की बात. because ताव को आप डॉ. का आला या पौराणिक कथाओं से ख्यात ‘रामबाण’ समझ […]
संस्मरण

मन में अजीब से ख़्याल उपज रहे थे…

जवाबदेही की अविस्मरणीय यात्रा भाग-2 सुनीता भट्ट पैन्यूली हमारा रिक्शा छन-छन घुंघरुओं की सी आवाज़ निकालते हुए हवा से बातें करते हुए कॉलेज की ओर जा रहा था, रिक्शा एक पतली तंग भीड़-भाड़ वाली गली में घुसा, ऐसा महसूस हो because रहा था मानो दुनिया भर के सारे मेहनत करने वाले हाथ अपनी-अपनी रोटी जुटाने […]
संस्मरण

रिस्पना की खोज में एक यायावर…

नदियों से जुड़ाव का सफर वर्ष 1993 में रिस्पना नदी से आरम्भ हुआ तो फिर आजीवन बना रहा. DBS  कॉलेज से स्नातक और बाद में DAV परास्नातक, पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान भी रिस्पना पर शोध कार्य जारी रहा. हिमालय की चोटियों से निकलने वाली छोटी-बड़ी जलधाराएँ- धारा के विपरीत बहने की उर्जा ने मुझे […]
संस्मरण

अर्थ और सौंदर्य से ही स्‍त्री जीवन में आता है नयापन!

जवाबदेही की अविस्मरणीय यात्रा भाग-1 सुनीता भट्ट पैन्यूली वर्तमान की मंजूषा में सहेजकर रखी गयी स्मृतियां अगर उघाड़ी जायें तो वे पुनरावृत्ति हैं उन अनुभवों को but तराशने हेतु जो तुर्श भी हो सकती हैं, मीठी भी या फिर दोनों… यक़ीनन कुछ न कुछ because हासिल हो ही जाता है इन स्मृतियों के सफ़र के […]
संस्मरण

लकड़ी जो लकड़ी को “फोड़ने” में सहारा देती

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—57 प्रकाश उप्रेती पहाड़ की संरचना में लकड़ी कई रूपों में उपस्थित है. वहाँ लकड़ी सिर्फ लकड़ी नहीं रहती. उसके कई रूप, नाम और प्रयोग हो जाते हैं. इसलिए जंगलों पर निर्भरता पर्यावरण के कारण नहीं बल्कि जीवन के कारण होती है. because जंगल, जमीन, जल, सबका संबंध जीवन […]
संस्मरण

पहाड़-सा है पहाड़ी ग्रामीण महिलाओं का जीवन!

बेहद कठिन था ह्यूपानी के जंगल से लकड़ी लाना प्रकाश चन्द्र पुनेठा हमारे पहाड़ में मंगसीर के महीने तक यानी कि दिसम्बर माह के अन्त तक पहाड़ की महिलाओं द्वारा धुरा-मांडा में घास कटाई तथा साथ ही खेतों में गेहूँ, जौ, सरसों व चने बोने का काम because पूरा जाता है. हम अपने बचपन में […]
संस्मरण

पारले-जी ने की ‘विज्ञापन स्ट्राइक’ (‘तुम’- ‘हम’)

प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है. शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें […]
संस्मरण

रिस्पना की खोज में एक यायावर…

नदियों से जुड़ाव का सफर वर्ष 1993 में रिस्पना नदी से आरम्भ हुआ तो फिर आजीवन बना रहा. DBS  कॉलेज से स्नातक और बाद में DAV परास्नातक, पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान भी रिस्पना पर शोध कार्य जारी रहा. हिमालय की चोटियों से निकलने वाली छोटी-बड़ी जलधाराएँ- धारा के विपरीत बहने की उर्जा ने मुझे […]