April 11, 2021
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बज उठेंगी हरे कांच की चूडियाँ…! 

मंजू दिल से… भाग-5 मंजू काला चूडियाँ पारंपरिक गहना है,because जिसका प्रयोग अमूनन हर भारतीय नारी करती है और जब तक उनकी कलाइयों पर ये सुंदर-सा गहना सज नहीं जाता, तब तक श्रंगार भला कैसे पूरा होगा! प्यारे हम भारतीय नारियाँ रंग-बिरंगी because चमकीली चूड़ियाँ कलात्मक एव सुरुचिपूर्ण ढंग से पहनकर अपनी
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केले के पत्‍तों पर भोजन करना स्‍वास्‍थ्‍य के लिए लाभदायक!

पलाश के पत्तों पर भोजन करना स्वर्ण पात्र में भोजन करने से भी उत्तम है! मंजू दिल से… भाग-4 मंजू काला हमारे देश में सामाजिक अथवा धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न होने के पश्चात इष्ट-मित्रों, रिश्तेदारों को भोजन के लिये आमन्त्रित करना एवं प्रसाद का वितरण हमारी  भोजन पद्धति का एक अंग है. because यद्यपि यह व्यवस्था […]
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हीर की फुलकारी…

‘फुलकारी पुलाव’ पंजाब की लुप्‍त होती जा रही एक रेसीपी है… मंजू दिल से… भाग-3 मंजू काला सोहने फुल्लां विच्चों फुल गुलाब नी सखि सोहणे देशां विच्चों देश पंजाब नी सखियों बगदी रावी ते झेलम चनाय नी सखियों देंदा भुख्या ने रोटी पंजाब दी सखियों… पंजाब यानी जिसके ह्रदय स्थल पर पांच नदियां- झेलम, चिनाब, […]
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रिसाले- मसालों के…

मंजू दिल से… भाग-2 मंजू काला जब भी मैं पहाडों पर भ्रमण करती हूँ, तो अक्सर महिलाओं को सिल बट्टे पर मसाले रगड़ते हुए गीत गाते देखकर एक कथानक की अविस्मरणीय पात्र को याद करती हूँ, जो because “मिस्ट्रेस ऑफ स्पाइसेज” की नायिका है और वह मसालों की जादुई शक्तियों को जानती है. वह अपनी […]
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सामरिक इतिहास के लिए विख्यात मातृवंशीय नंबूदरी ब्रह्मणों की विवाह पद्धति

मंजू काला मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से ताल्लुक रखती हैं. इनका बचपन प्रकृति के आंगन में गुजरा. पिता और पति दोनों महकमा-ए-जंगलात से जुड़े होने के कारण, पेड़—पौधों, पशु—पक्षियों में आपकी गहन रूची है. आप हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन करती हैं. so आप ओडिसी की नृतयांगना होने के साथ रेडियो-टेलीविजन की […]
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दीव से ओखा तक

गुजरात यात्रा – सोमनाथ से द्वारिकाधीश तक डॉ. हरेन्द्र सिंह असवाल  यात्रायें मनुष्य जीवन जीवन की आदिम अवस्था से जुड़ी हुई हैं. चरैवेति चरैवेति से लेकर अनन्त जिज्ञासायें मनुष्य को घेरे रहती हैं. इस बार दिल्ली की लंबी प्रदूषित अवधि ने मुझे बाहर निकलने के लिए इतना विवश किया कि बिना किसी योजना के मै […]
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“शहीदों की निशानियों पर बदहाली की धूल”

विजय भट्ट जब कफस से लाश निकली उस बुलबुले नाशाद की. इस कदर रोये कि हिचकी बंध गयी सैयाद की.  कमसिनी में खेल खेल नाम ले लेकर तेरे. हाथ से तुर्बत बनायी, पैर से बबार्द की. शाम का वक्त है, कबरों को न ठुकराते चलो.  जाने किस हालत में हो मैयत किसी नाशाद की. भारत […]