April 11, 2021
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जल विज्ञान

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वराहमिहिर का जलान्वेषण विज्ञान आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर

भारत की जल संस्कृति-24 डॉ. मोहन चंद तिवारी भारतीय जलविज्ञान की पिछली पोस्टों में बताया जा चुका है कि वराहमिहिर के भूमिगत जलान्वेषण विज्ञान द्वारा वृक्ष- वनस्पतियों,भूमि के उदर में रहने वाले जीव-जन्तुओं की निशानदेही और भूमिगत शिलाओं या चट्ठानों के लक्षणों और संकेतों के आधार पर भूमिगत जल को कैसे
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जलाशय निर्माण में वास्तु संरचना और ग्रह-नक्षत्रों की भूमिका

भारत की जल संस्कृति-23 डॉ. मोहन चंद तिवारी हमारे देश के प्राचीन जल वैज्ञानिकों ने because वास्तुशास्त्र की दृष्टि से भी जलाशय निर्माण के सम्बन्ध में विशेष मान्यताएं स्थापित की हैं. हालांकि इस सम्बंध में प्राचीन आचार्यों और वास्तु शास्त्र के विद्वानों के अलग अलग मत और सिद्धांत हैं. मूल अवधारणा यह है कि जिस स्थान […]
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“बृहत्संहिता में जलाशय निर्माण की पारम्परिक तकनीक”

भारत की जल संस्कृति-22 डॉ. मोहन चंद तिवारी पिछले लेखों में बताया गया है कि एक पर्यावरणवादी जलवैज्ञानिक के रूप में आचार्य वराहमिहिर द्वारा किस प्रकार से वृक्ष-वनस्पतियों की निशानदेही करते हुए, जलाशय के उत्खनन because स्थानों को चिह्नित करने के वैज्ञानिक तरीके आविष्कृत किए गए और उत्खनन के दौरान भूमिगत जल को ऊपर उठाने […]
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“बृहत्संहिता में शिलाभेदन के रासायनिक फार्मूले”

असगोली की ग्राउंड रिपोर्ट सहित  “जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने से भी बड़ा काम है,because उनकी सड़क माफियों के अत्याचार से रक्षा करना.” भारत की जल संस्कृति-21 डॉ. मोहन चंद तिवारी हम जब प्राचीन काल की गुफाओं अजन्ता, so ऐलोरा,मंदिरों,कुओं और विशाल जलाशयों आदि को देखते हैं तो आश्चर्य होता है कि आखिर कैसे इन विशाल […]
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भारत में भौमजल की दशा और दिशा : एक भूवैज्ञानिक विश्लेषण

भारत की जल संस्कृति-20 डॉ. मोहन चंद तिवारी भारत एक विकासशील देश है.प्रत्येक क्षेत्र में because उसकी प्रगति हो रही है और उसकी जनसंख्या में भी वृद्धि हो रही है.अतः वर्ष 2025 तक 1093 बिलियन क्यूबिक मीटर्स जल की आवश्यकता होगी. इसके लिए वर्षाजल को बहकर समुद्र में जाने से रोकने के लिए वर्षाजल संग्रहण […]
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“वराहमिहिर के अनुसार भूमिगत शिलाओं से जलान्वेषण”

भारत की जल संस्कृति-18 डॉ. मोहन चंद तिवारी आधुनिक भूविज्ञान के अनुसार भूमि के उदर में ऐसी बड़ी बड़ी चट्टानें होती हैं जहां सुस्वादु जल के सरोवर बने होते हैं. केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार भारतीय प्रायद्वीप का लगभग because 70 प्रतिशत हिस्सा जिन ‘कड़ी चट्टानों’ (Aquifers) से बना है उन चट्टानों के […]
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“वराहमिहिर के अनुसार दीमक की बांबी से भूमिगत जलान्वेषण”

भारत की जल संस्कृति-17 डॉ. मोहन चंद तिवारी वराहमिहिर ने भूमिगत जल को खोजने के लिए वृक्ष-वनस्पतियों के साथ साथ भूमि के उदर में रहने वाले मेंढक, मछली, सर्प, दीमक आदि जीव-जन्तुओं को निशानदेही का butआधार इसलिए बनाया है क्योंकि ये सभी जीव-जन्तुओं को आद्रता बहुत प्रिय है और अपने जीवन धारण के लिए ये […]
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“वराहमिहिर के अनुसार वृक्ष-वनस्पतियों की निशानदेही से भूमिगत जल की खोज”

भारत की जल संस्कृति-16 डॉ. मोहन चंद तिवारी प्राचीन काल के कुएं, बावड़ियां, नौले, तालाब, because सरोवर आदि जो आज भी सार्वजनिक महत्त्व के जलसंसाधन उपलब्ध हैं, उनमें बारह महीने निरंतर रूप से शुद्ध और स्वादिष्ट जल पाए जाने का मुख्य कारण यह है कि इन जलप्राप्ति के संसाधनों का निर्माण हमारे पूर्वजों ने वराहमिहिर […]
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“वराहमिहिर की ‘बृहत्संहिता’ में भूमिगत जलशिराओं का सिद्धान्त”

भारत की जल संस्कृति-15 डॉ. मोहन चंद तिवारी (12मार्च, 2014 को ‘उत्तराखंड संस्कृत अकादमी’, हरिद्वार द्वारा ‘आईआईटी’ रुड़की में आयोजित विज्ञान से जुड़े छात्रों और जलविज्ञान के अनुसंधानकर्ता विद्वानों के समक्ष मेरे द्वारा दिए becauseगए वक्तव्य ‘प्राचीन भारत में जलविज्ञान‚ जलसंरक्षण और जलप्रबंधन’ से सम्बद्ध चर्चित और संशोधित लेख) अखबारों प्राचीन काल के कुएं बावड़ियां,नौले […]
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प्राचीन भारत में मेघविज्ञान और बादलों के प्रकार

भारत की जल संस्कृति-14 डॉ. मोहन चंद तिवारी (7 फरवरी, 2013 को रामजस कालेज, ‘संस्कृत परिषद्’ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘प्राचीन भारत में जलवायु विज्ञान’ के अंतर्गत मेरे द्वारा दिए गए वक्तव्य “प्राचीन भारत में मेघविज्ञान” का संशोधित लेख) भारत प्राचीन भारतीय मेघविज्ञान का इतिहास भी अन्य विज्ञानों की भांति वेदों से प्रारम्भ होता है.because […]