September 22, 2020
संस्मरण

राष्ट्र नायक

बुदापैश्त डायरी-11

  • डॉ. विजया सती

बुदापैश्त में रहते हुए हमने जाना कि 15 मार्च हंगरी के इतिहास में एक विशेष दिन है. यह 1948 की क्रान्ति की स्मृति में मनाया जाने वाला राष्ट्रीय दिवस है. इस क्रान्ति के प्रमुख व्यक्तित्व के रूप में पेतोफ़ी शांदोर को याद किया जाता है. हंगरी की क्रान्ति और आज़ादी के इतिहास में पेतोफ़ी शांदोर का नाम बहुत आदर के साथ लिया जाता है. पेतोफ़ी राष्ट्रीय  कवि  माने जाते हैं और हंगरी की उस राष्ट्रीय कविता के जनक भी जिसने क्रान्ति को प्रेरित किया, वह कविता जिसका स्वर है – उठो हंगरीवासियों! हम अब और अधिक गुलाम न रहेंगे.

कवि पेतोफ़ी शांदोर

पेतोफ़ी शांदोर का लैटिन नाम अलेक्सांद्र पेत्रोविच है. दरअसल अलेक्सांद्र का हंगेरियन रूपांतर शांदोर है. साधारण ग्रामीण पिता और सेविका तथा धुलाई का काम करने वाली मां  की संतान शांदोर के लिए वह पल कठिन था जब एक पारिवारिक कठिनाई और प्राकृतिक आपदा में घर का पैसा खत्म हो जाने के कारण 15 वर्ष की उम्र में इन्हें स्कूल छोडना पड़ा. अब जीवन का असल संघर्ष शुरू होने पर युवा पेतोफ़ी ने हर तरह के काम किए – थियेटर में, अध्यापन, सैनिक बने और कई यात्राएं की. इस समय वे अखबारों के लिए लिखने लगे, पर पैसे का अभाव बना रहा. कुपोषण के कारण पेतोफ़ी बहुत बीमार हो गए किन्तु दोस्तों की मदद से उबरे. इस समय तक युवा कवि के रूप में पेतोफ़ी के जीवन का यह मूल मन्त्र बना कि लोक-जीवन, लोकगीतों  और लोक-गाथाओं में जो बहुत कुछ मूल्यवान है, उसे बचाना होगा. उन्होंने परम्परागत गीत रचे. वे साहित्य और थियेटर की  भाषा के रूप में हंगेरियन को स्थापित करने को प्रयत्नशील  हुए, जो अभी तक जर्मन-आधरित थी.

पेतोफ़ी शांदोर का जन्म 1 जनवरी 1823 को हुआ और उनकी मृत्यु अनुमानत: 31 जुलाई 1849 को समझी जाती है- ऐसा माना जाता है कि या तो वे आज़ादी के उस युद्ध में मारे गए जिसमें अंतिम बार जीवित देखे गए थे या लापता होने के कुछ वर्ष बाद 1856 में क्षयरोग से मरे.

काव्य-सृजन के साथ-साथ अब वे वैश्विक क्रान्ति के बारे में भी सोचते थे. वे हंगरी की क्रान्ति के दो प्रमुख दस्तावेजों – बारह सूत्र और राष्ट्रीय कविता के सहलेखक और लेखक रहे. इन दस्तावेजों को क्रान्ति के चरम पर सेंसरशिप का अंत घोषित करते हुए प्रकाशित किया गया था. वे उस हंगेरियन क्रांतिकारी सेना में शामिल हुए जिसे आरम्भिक सफलता के बाद रूस के जार की ताकत के सम्मुख पराजय मिली थी.

पेतोफ़ी शांदोर का जन्म 1 जनवरी 1823 को हुआ और उनकी मृत्यु अनुमानत: 31 जुलाई 1849 को समझी जाती है- ऐसा माना जाता है कि या तो वे आज़ादी के उस युद्ध में मारे गए जिसमें अंतिम बार जीवित देखे गए थे या लापता होने के कुछ वर्ष बाद 1856 में क्षयरोग से मरे. आधिकारिक रूप से पेतोफ़ी का शव न मिलने के कारण और एक रूसी मिलिट्री डॉक्टर की डायरी में दर्ज ब्यौरे से पेतोफ़ी के जीवित होने की अफवाह बनी रही. समझा जाता है कि आज़ादी की लड़ाई के बाद जो अठारह सौ हंगेरियन सैनिक साइबेरिया ले जाए गए, पेतोफ़ी उनमें से एक थे.

अपनी रचनाओं में पेतोफ़ी शांदोर ने सीमाओं और बंधन के खिलाफ लिखा. उन्होंने जीवन, दुःख, प्रेम, स्मृति और एकाकीपन पर कविताएं लिखी. कालांतर में  प्रौढ़ और सूक्ष्म संवेदनशीलता की कविताएं लिखी. यह जानना भी कम रोचक नहीं कि उनकी कविताओं को युवा फ्रेडरिक नीत्शे ने उस समय संगीत में ढाला जब दर्शन के क्षेत्र में विख्यात होने से पहले वे क्लैसिक पढ़ रहे थे और अपनी रूचि से संगीत निर्मित करते थे.

अपने समकालीन महत्वपूर्ण हंगेरियन कवि अरण्य यानोश से पेतोफ़ी की आजीवन मित्रता रही.

मित्र कवि अरण्य यानोश

1846 में पारिवारिक विरोध के बावजूद कवि ने यूलिया से विवाह किया. उनकी प्रेम कविता में पत्नी के प्रति गहरा समर्पण भाव है. अपनी एक प्रसिद्ध प्रेम कविता में वे पत्नी से प्रश्न करते हैं

जब मैं न रहूँगा
तब क्या जल्दी ही
नया प्यार पाकर
तुम मेरा नाम तक भुला दोगी?

हंगरी की 1848 की क्रान्ति को दबा दिया गया था. किन्तु ताज़गी और स्फूर्ति से भरा पेतोफ़ी का काव्यस्वर उस समय तक लोकप्रिय हो गया था और अब भी अलग पहचाना जाता है. 1940 में बोरिस पोस्तरनाक ने रूसी भाषा में इनकी कविताओं का बहुप्रशंसित अनुवाद किया.  

दुखद है कि कवि ने प्रेम की जिस निष्ठा को पत्नी से चाहा, वह संभव न हुई. पत्नी ने शीघ्र ही पुनर्विवाह कर लिया जबकि पेतोफ़ी की प्रणय–दृष्टि को उस अन्य कविता में भी देखा जा सकता है जिसमें कवि वृक्ष बन जाना चाहता है, यदि प्रेमिका उसका पुष्प बने तो ! वह पुष्प बन जाना चाहता है यदि प्रेमिका उस पर ओस बूँद बने तो ! वह  ओस बूँद बन जाना चाहता है यदि प्रेमिका सूर्यकिरण बने तो !

हंगरी की 1848 की क्रान्ति को दबा दिया गया था. किन्तु ताज़गी और स्फूर्ति से भरा पेतोफ़ी का काव्यस्वर उस समय तक लोकप्रिय हो गया था और अब भी अलग पहचाना जाता है. 1940 में बोरिस पोस्तरनाक ने रूसी भाषा में इनकी कविताओं का बहुप्रशंसित अनुवाद किया. देश और विदेश में उनके सम्मान का सिलसिला भी शुरू हुआ, केवल बुदापैश्त में ही पैतोफी शांदोर के नाम पर 11 सड़कें और 4 चौक हैं. एक राष्ट्रीय रेडियो स्टेशन है और दुना नदी पर एक सुन्दर पुल भी जहां उनकी विशाल प्रतिमा भी स्थापित है.

पेतोफ़ी का विद्रोह सदियों तक प्रेरणा बना रहे तो क्या आश्चर्य !

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज की सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर (हिन्दी) हैं। साथ ही विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हिन्दी – ऐलते विश्वविद्यालय, बुदापैश्त, हंगरी में तथा प्रोफ़ेसर हिन्दी – हान्कुक यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरन स्टडीज़, सिओल, दक्षिण कोरिया में कार्यरत रही हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, पुस्तक समीक्षा, संस्मरण, आलेख निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं।)

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