October 30, 2020
संस्मरण

शहर में मिले गांधी जी और देश में मिले प्रेमचंद!

बुदापैश्त डायरी-10

  • डॉ. विजया सती

बुदापैश्त में गांधी

 गांधी जहां कहीं भी हों, उस जगह जाना, उनके साथ पल भर को ही सही, बस होना मुझे प्रिय है.

और गांधी विश्व में कहां नहीं? तो बुदापैश्त में भी मिले. .. गैलर्ट हिल पर !

इस नन्हीं खूबसूरत पहाड़ी पर है- गार्डन ऑफ़ फिलॉसफी या फिलॉसफर्स गार्डन !

यहाँ धातु और ग्रेनाईट से बनी कई प्रतिमाएं स्थापित हैं.

शानदार हैं प्रवेश द्वार पर लिखी पंक्तियां ..

For a better understanding of one another.

आप मानें या न मानें ..दरकार तो यही है आज !

विश्व की विभिन्न संस्कृतियों और धर्म की प्रतीक आकृतियाँ यहाँ एक गोलाकार में संजोई गई हैं, धातु की पांच मुख्य आकृतियाँ हैं – इब्राहिम, अखनातेन, ईसा मसीह, बुद्ध और लाओत्से की.

कला के माध्यम से सहनशीलता और शांतिपूर्ण सहस्तित्व का सन्देश देते आकार हैं – गांधी, दारुमा, और संत फ्रांसिस.

अपनी शान्ति में मगन खड़े ये व्यक्तित्व मन को चैन देते हैं.

यहाँ से शहर के पैश्त इलाके का सुन्दर विस्तार भी देखा जा सकता है.

राजधानी के सबसे प्रसिद्ध व्यू-पॉइंट सितादेला के बहुत नजदीक होने पर भी इस स्थल की खासियत यह है कि वहां की चहल पहल की तुलना में यहाँ शान्ति का साम्राज्य है !

बुदापैश्त में प्रेमचंद

गरीब बेसहारा किसान मजदूर के दुःख दर्द को शब्द देने वाले, प्रेमचंद सरीखे हैं हंगरी के प्रसिद्ध उपन्यासकार और कहानीकार मोरित्स जिग्मोंद.

मोरित्स का आरंभिक जीवन गाँव में बीता, उदास एकाकी बचपन, परिवार से दूर.. वे कहते हैं – मानो मैं इसलिए ही लेखक बन गया कि वे जख्म दिखाऊं जो मुझे सात से दस साल की उम्र तक लगे थे ..

जब उन्हें हंगेरियन लोक साहित्य को एकत्रित करने का काम मिला तो उन यात्राओं में उन्होंने हंगेरियन जीवन के विविध पक्ष देखे. इस समय उन्हें ग्रामीण जीवन के जो गहन अनुभव हुए, वे ही उनकी रचनाओं के स्रोत बने.

उनका विवाह यंका से हुआ, किन्तु दो संतानें जीवित न रही, दूसरे पुत्र की मृत्यु के बाद जिग्मोंद ने ‘सात पैसे’ कहानी लिखी, जो उस समय की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका में प्रकाशित हुई.

इस कहानी का हंगेरियन साहित्य में आज भी विशेष महत्व है. विश्व की बहुत सी भाषाओं में अनूदित यह कहानी उनकी प्रतिनिधि कहानी बनी और वे साहित्य जगत में स्थापित हो गए.

जीवन के अनवरत संघर्षों ने मोरित्स के निजी जीवन को तनावपूर्ण बना दिया. जो पत्नी उनका सतत संबल और प्रेरणा थी, उसके साथ सम्बन्ध इतने खराब हुए कि यंका ने आत्महत्या कर ली. मोरित्स के नारी पात्रों में उनकी पत्नी की छवि सहज ही पाई जा सकती है.

उनका पहला कहानी संग्रह भी ‘सात पैसे’ नाम से ही छपा और वे पूरी तरह साहित्य को समर्पित हो गए. उन्होंने गाँव के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तनों को शब्द दिए, वे गरीब जन के प्रतिनिधि लेखक बने.

मोरित्स ने नाटक लिखे, उपन्यास लिखे और लघु उपन्यास भी.’मौत तक अच्छे बने रहो’ उपन्यास एक तरह से उनका भावुक व्यक्तिगत आख्यान ही है, जिसमें गरीब परिवार का एक नेकदिल लड़का कठिन परिस्थितियों के बावज़ूद ईमानदार बना रहता है.

जीवन के अनवरत संघर्षों ने मोरित्स के निजी जीवन को तनावपूर्ण बना दिया. जो पत्नी उनका सतत संबल और प्रेरणा थी, उसके साथ सम्बन्ध इतने खराब हुए कि यंका ने आत्महत्या कर ली. मोरित्स के नारी पात्रों में उनकी पत्नी की छवि सहज ही पाई जा सकती है.

मोरित्स ने अभिनेत्री मारिया से विवाह किया, यह एक असफल विवाह रहा. ‘जब तक प्यार ताज़ा है’ उपन्यास में उन्होंने विवाह की असफलता के कारणों का विश्लेषण किया. उनकी आत्मकथा का धारावाहिक प्रकाशन भी हुआ.

मोरित्स का अनूठा उपन्यास है – अनाथ लड़की…यह परिचय में आई एक अनाथ लड़की की आपबीती है, उसके माध्यम से उन्होंने महानगर की समस्याओं, सर्वहारा वर्ग और समाज के हाशिए पर जीने वाले आवारा लोगों की स्थिति उजागर की.

मोरित्स मानते हैं कि गरीबी में दुःख के साथ-साथ आशा, उमंग और प्रसन्नता भी सर्वहारा वर्ग के जीवन का हिस्सा है.

पत्रकार के रूप में जीवन शुरू करने वाले मोरित्स जिग्मोंद की रचनाओं का अनुवाद विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में हुआ. उनकी भाषा हंगरी के जनजीवन और समाज से जुड़ी ऐसी जीवंत बोलचाल की भाषा है. ..कि उन्हें पढ़ना प्रेमचंद के साथ होना है !

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज की सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर (हिन्दी) हैं। साथ ही विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हिन्दी – ऐलते विश्वविद्यालय, बुदापैश्त, हंगरी में तथा प्रोफ़ेसर हिन्दी – हान्कुक यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ॉरन स्टडीज़, सिओल, दक्षिण कोरिया में कार्यरत रही हैं। कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, पुस्तक समीक्षा, संस्मरण, आलेख निरंतर प्रकाशित होते रहे हैं।)

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